मंगळवार, ३० नोव्हेंबर, २०२१

शंका- 'शंका-समाधान' क्या है, इससे क्या लाभ होते हैं। कृपया इसके नियम बताइए?

शंका- 'शंका-समाधान' क्या है, इससे क्या लाभ होते हैं। कृपया इसके नियम बताइए?
समाधान-> 'शंका-समाधान' एक आवश्यक कार्यक्रम है। ऋषि कहते हैं कि, जब-जब विद्वानों के समीप जाएं, तब-तब सबके कल्याण के लिए प्रश्नोत्तर अवश्य करें। "जब-जब विद्वानों के समीप जाएं, तब-तब सबके कल्याण के लिए" यह वाक्यांश खास ध्यान देने का है। अपने और सबके हित के लिए प्रश्न पूछें। इससे अपनी शंका का समाधान तो होगा ही, साथ ही दूसरों को भी लाभ मिलेगा। इस दृष्टि से प्रश्नोत्तर कर सकते हैं।

'शंका-समाधान' कार्यक्रम के बारे में कुछ बातें भूमिका के रूप में समझें। दरअसल, इसमें दो हिस्से हैं। एक हिस्सा है- शंका दूसरा हिस्सा है- उसका समाधान करना यानि कि उत्तर देना। पूछना, और

सवाल उठता है कि, इसमें से कौन सा हिस्सा सरल है ? वस्तुतः शंका पूछना सरल है, जबकि उत्तर देना कठिन । सरल काम आपके हिस्से में है, और कठिन काम मेरे हिस्से में है, क्योंकि उत्तर मुझे देना है। कोई भी काम अगर नियमपूर्वक किया जाए, तो उसमें बहुत

लाभ होता ही है। यदि नियम तोड़कर काम करेंगे, तो उससे लाभ तो होगा नहीं, उलटे नुकसान ही होगा। कार्यक्रम 'शंका-समाधान' आपके लाभ के लिये शुरु किया गया है। अतः स्पष्ट है कि - यदि 'शंका-समाधान के नियमों का पालन करेंगे, तो बहुत लाभ होगा। इसके विपरीत, विहित नियमों का पालन नहीं करेंगे, तो नुकसान होगा।

भगवान की कृपा से, गुरुजनों के आशीर्वाद से मुझे काफी कुछ सीखने को मिला है। उसके आधार पर मैं आपके प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करूंगा। पर हम दोनों इस बात का ध्यान रखेंगे कि 'शंका-समाधान' के नियमों का पालन हो ।

'शंका-समाधान' के मोटे-मोटे नियम बताता हूँ शंका पूछने वाला व्यक्ति 'जिज्ञासा भाव' से प्रश्न पूछे कि "हम तो बस जानना चाहते हैं।" अपनी समस्या को सुलझाने के लिए प्रश्न होना चाहिए। उत्तर देने वाला व्यक्ति भी इसी भावना से उत्तर दे कि • सामने वाले की शंका दूर करनी है, उसकी समस्या को सुलझाना है। वह किसी और भावना से उत्तर नहीं दे।

आपकी जो समस्या जहाँ अटकी है, उसको सुलझाने के लिए ही उत्तर दिया जाएगा। उत्तर देने वाला भी इसी भावना से उत्तर दे कि मुझे इसकी शंका का समाधान करना है। जो समस्या अटक रही है, उसको सुलझाना है। उसका मार्ग स्पष्ट करना है, वो कहाँ अटका हुआ है, उसकी वो उलझन दूर करनी है। इस भावना से उत्तर देना चाहिए।

पूछने वाला व्यक्ति कभी-कभी अपनी भावनाएं गलत बना लेता है। ऐसा व्यक्ति सोचता है कि - “मैं ऐसा प्रश्न पूघूँगा, जिसका सामने वाले को उत्तर ही नहीं सूझे।” वे लोग गलत सोचते कि "हम ऐसा कठिन, टेढ़ा-मेढ़ा सवाल पूछेंगे कि सामने वाला जिसका उत्तर ही नहीं दे पाएगा। और जब वो उत्तर नहीं दे पाएगा, तब सब तमाशा देखेंगे। सब लोग उस पर हॅसेंगे, तो बड़ा मजा आएगा। “याद रखें कि ऐसी भावना से प्रश्न पूछने से लाभ नहीं होता, बल्कि नुकसान ही होता है। इसलिए ऐसी भावना से प्रश्न पूछना ठीक नहीं है।

आप भी एक गारंटी दें कि आप प्रश्न 'जिज्ञासा-भाव' से पूछेंगे और मन में कोई गलत उद्देश्य नहीं बनायेंगे।' दुःख देने के लिए, हार-जीत के लिए, सामने वाले को अपमानित करने के लिए, उसको नीचा और अपने को ऊँचा दिखाने के लिए प्रश्न-उत्तर नहीं करना है। मैं आपको अपनी ओर से गारंटी देता हूँ कि, आपकी समस्याओं को सुलझाने के लिए ही आप के प्रश्नों के उत्तर दूँगा। किसी को दुःख देना, अपमानित करना आदि एक प्रतिशत भी मेरा उद्देश्य नहीं है।

कभी-कभी ऐसे प्रश्न भी सामने आ सकते हैं कि पूछने वाले ने एक प्रश्न पूछ लिया और बताने वाले को उत्तर समझ में नहीं आया। वहाँ पर मान-अपमान के कारण उसको झूठ नहीं बोलना चाहिए। उल्टा-पुल्टा कोई भी जवाब दे दें, ऐसा भी नहीं करना चाहिए। उत्तर नहीं सूझता तो साफ बोल दें - "भई, हमको उत्तर समझ में नहीं आया।"

पहले से मेरा स्पष्टीकरण सुन लीजिए। उत्तर मालूम नहीं मालूम तो साफ बोल देंगे कि, नहीं आता। झूठ नहीं बोलेंगे, जानबूझकर है • बता देंगे, धोखा नहीं देंगे, यह गारंटी है। उत्तर आता नहीं है और तोड़मरोड़ करते रहें, ऐसा काम हमें नहीं आता है। ऐसा करना यम-नियम के विरुद्ध है। गुरुजी ने मुझे बहुत मजबूत बना दिया है। इसलिए मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ता। जिस प्रश्न का उत्तर मुझे नहीं पता है, मैं तो साफ बोल देता हूँ कि इस प्रश्न का उत्तर मुझे नहीं आता। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देने की कोई गारंटी नहीं है।

जिस प्रश्न का उत्तर मुझे नहीं आता तो भविष्य में और पढ़ेंगे, सीखेंगे और कभी उत्तर समझ में आ जाएगा तो फिर आपको बताएंगे। जितना समझ में आएगा, उतना बता देंगे। यह हमारी ओर से गारंटी है। पक्की बात बताएंगे, पूरा जोर लगाएंगे।

हम बुद्धि से, तर्क से, शास्त्रों के आधार पर प्रामाणिक बात बताएंगे, ठीक बताएंगे, धोखा नहीं देंगे, छल नहीं करेंगे, गलत उत्तर नहीं देंगे। हाँ, अनजाने में कोई भूल हो जाए, तो वो एक अलग बात है। अज्ञानतावश कोई भूल हो गई, बाद में समझ में आ गई कि, यह तो गलत बात कह दी, तो उसका सुधार कर उसको ठीक कर देंगे। हम जानबूझकर गलत बात नहीं कहेंगे।

योग शिविर में प्रश्न लिखकर भेंजे तो अच्छा रहेगा। प्रश्न पूछने वाले प्रश्न के नीचे अपना नाम अवश्य लिखें, जिससे कि जरूरत पड़े तो पूछा जा सके कि "भई, यह प्रश्न तो मुझे समझ में नहीं आया। इसका स्पष्टीकरण दीजिए।" . हो सकता है कि आपके विचारों और हमारे विचारों में अंतर हो। कई बातों में विरोध भी हो सकता है, टकराव हो सकता है, लेकिन कोई बात नहीं। आपने अब तक जैसा सुना-सीखा, आप वैसी बात जानते मानते हैं। हमने जैसा सुना-सीखा, हम वैसा जानते मानते हैं। परस्पर कुछ विचारों में अंतर हो सकता है। उसकी कोई चिंता नहीं। फिर भी आप प्रेमपूर्वक अपनी शंका पूछें और उतने ही प्रेमपूर्वक उसका उत्तर भी सुनें।

मान लो कि कोई बात आपने 20-30 साल से सुन रखी है, और वो बात आपको ठीक लगती है। और हमने यहाँ उसके विरुद्ध कोई बात बता दी कि, यह बात ठीक नहीं है। अतः आपको हमारी वो बात जचती नहीं है।

आपको बात समझ में नहीं आई तो कोई बात नहीं। उसके दो विकल्प हैं। पहला- या तो अलग से बैठकर कुछ विस्तार से बातचीत कर लेंगे। आगे और बताने का प्रयास करेंगे, प्रमाण देंगे, तर्क देंगे। हो सकता है कि बात कुछ समझ में आ जाए।

समझाने पर भी समझ में नहीं आया तो झगड़ा नहीं करेंगे। आपकी ओर से भी ऐसी गारंटी मिलनी चाहिए कि आप भी झगड़ा नहीं करेंगे, झगड़े के लिए प्रश्न नहीं पूछेंगे। आप केवल जिज्ञासा-भाव से प्रश्न पूछेंगे। दूसरा विकल्प है जो बात समझ में नहीं आई, उसको • साइड में विचाराधीन (पेंडिंग) के रूप में रख दें। आगे उस पर और विचार करते रहेंगे। जरूरी नहीं कि हर एक बात आपको समझ में आ ही जाए। आपने प्रश्न पूछा, हमने उत्तर दिया। हम इस बात की कोई गारंटी नहीं लेते कि आपको हमारी सारी बातें आज ही समझ आ जाएंगी। ऐसा बिलकुल नहीं होगा। कुछ ऐसी बातें होती हैं, जिनको समझने में समय लगता है। जो बात समझ में न आये, तो कोई बात नहीं। यह न कई कि, आपका उत्तर गलत है। आपका यह कहना अनुचित है। यह आपका अधिकार नहीं है।

अगर आप मुझसे यह कहते हैं कि आपका उत्तर गलत है', तो इसका मतलब यही हुआ कि सही उत्तर क्या है, वह आप पहले से जानते हैं। और जब आप सही उत्तर जानते हैं, तो फिर प्रश्न पूछा क्यों ? मेरी परीक्षा लेने के लिए नहीं आए आप। यह गलत बात है। यदि आप परीक्षा लेने की भावना से प्रश्न पूछेंगे, तो आपको नुकसान हो सकता है। इसलिए परीक्षा लेने के उद्देश्य से कोई प्रश्न न पूछें। अपनी समस्या को सुलझाने के लिए पूछें और इसी भावना से मैं आपको प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करूँगा।

उत्तर समझ में आया तो बहुत अच्छा, नहीं आया तो चिंतन करें, विचार करें। जो लोग कुछ स्वाध्याय करते हैं, शास्त्रों को पढ़ते हैं, अध्ययन करते हैं, कुछ पृष्ठभूमि बनी हुई है, उनको हमारी बात जल्दी समझ में आएगी।

जो स्वाध्याय नहीं करते, सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका, दर्शन, उपनिषद्, वेद, मनुस्मृति आदि ग्रन्थों का अध्ययन नहीं करते, तो उनको बात समझने में देर लगेगी। उनका बैकग्राउण्ड नहीं है। अगर आपने पहले से कुछ स्वाध्याय किया है, आपका कुछ पूर्वचिन्तन है, तो हो सकता है कि बात आज ही आज आपको समझ में आ जाए। अगर स्वाध्याय कम है तो हो सकता है कि आज समझ में नहीं आए।

आज आप उस बात को सुनें, उस पर विचार करें, लेकिन फिर भी समझ में नहीं आए। हो सकता है कि एक हफ्ते में समझ में आ जाए। समझने में अधिक समय भी लग सकता है। दो हफ्ते, पन्द्रह दिन, एक माह, दो माह, छह माह भी लग सकते हैं। कोई-कोई बात ज्यादा कठिन होती है कि, वो छह महीने में भी समझ में नहीं आती। ऐसी कठिन कठिन बातें भी होती हैं, जिनको समझने में कई-कई वर्ष लग जाते हैं। कुछ बातें दिमाग में कई वर्षों के बाद बैठती हैं ।

बात समझ में नहीं आयी, तो कोई चिंता की बात नहीं है। झगड़ा नहीं करना, यह नहीं कहना कि आपका उत्तर गलत है। यह कहना ठीक है कि “आपने उत्तर दिया, मगर वो हमारी समझ में नहीं आया। इस पर हम और सोचेंगे, विचार करेंगे, पढ़ेंगे, अध्ययन करेंगे। धीरे-धीरे समझ में आएगा।" एक उदाहरण दे रहा हूँ। प्रश्न है संसार में व्यक्ति को सम्मान की इच्छा करनी चाहिए या अपमान की इच्छा करनी चाहिए ? प्रायः सबका उत्तर यही होगा कि सम्मान की इच्छा करनी चाहिए। यह उत्तर गलत है। सही उत्तर है अपमान की इच्छा (आध्यात्मिक व्यक्ति को) करनी चाहिए। दरअसल, यह बात आपकी समझ में आज तो नहीं बैठेगी। इसको दिमाग में बैठाने के लिए कई साल चाहिए। कई साल तपस्या करनी पड़ेगी, तब यह बात समझ में आएगी कि अपमान की इच्छा करनी चाहिए। यह मेरे अपने घर की बात नहीं है। यह महर्षि मनु जी की बात है। मनुस्मृति में कहा है

सम्मानाद ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव । 
अमृतस्येव चाकाङ्.क्षेदवमानस्य सर्वदा ॥

“ब्राह्मण, योगाभ्यासी सम्मान से ऐसे डरता रहे, जैसे व्यक्ति विष से डरता है। जैसे जहर से डर लगता है, ऐसे ही व्यक्तिको सम्मान से डरना चाहिये। अपमान की इच्छा ऐसे करनी चाहिए, जैसे व्यक्ति अमृत की इच्छा करता है।" यह बात समझने में बड़ी कठिन है।

ऐसे ही और भी बहुत सी बातें होंगी जो आपको आज समझ में न आएं, तो इसमें चिन्ता की कोई बात नहीं है। वो बातें सच्ची हैं, प्रमाणिक हैं। धीरे-धीरे समझ में आएंगी। कुछ सरल बातें होती हैं, कुछ कठिन बातें होती हैं। सरल बातें जल्दी समझ में आ जाती हैं, कठिन बातों को समझने में समय लगता है। यही सिद्धांत है।

'शंका-समाधान' का एक नियम यह है कि प्रश्न पूछने वाला व्यक्ति शंका के रूप में अपनी बात को रखे कि - “यह बात हमारी समझ में नहीं आयी। कृपया हमको समझाइए।" इस तरह से बात नहीं रखे कि "मैं ऐसा-ऐसा मानता हूँ।" इसका मतलब यह कि आपने तो अपने पक्ष की स्थापना कर दी, यह तो 'शंका-समाधान' नहीं रहा। इसका नाम है - ‘शास्त्रार्थ' । 

जब आप अपने पक्ष की स्थापना करते हैं कि "मैं ऐसा मानता हूँ", तो फिर यह शास्त्रार्थ हो गया। आप ऐसा मानते हो और मैं ऐसा मानता हूँ, तो फिर दोनों के विचारों में टक्कर है। यहाँ टक्कर नहीं करनी है।

अगर किसी को टक्कर करने का शौक है, तो अलग से बैठकर करेंगे। मैं टकराने के लिए भी तैयार हूँ, डरता नहीं हूँ। पर इस समय टकराने का काम नहीं है। इस समय तो 'शंका-समाधान' का काम है। इसी उद्देश्य से हम इस कार्यक्रम को चलाएंगे। इस प्रकार इन नियमों का पालन करें। आपको बहुत लाभ होगा।

मंगळवार, ९ नोव्हेंबर, २०२१

आर्य_ही_आदिसंस्थापक, आदर्श मूल निवासी है भारतवर्ष के

अंग्रेजों ने भारत आगमन से ही सांस्कृतिक जहर घोलना शुरू कर दिया राम कृष्ण के वंशज भारत वासियों को  आर्य  द्रविड़ में बांट दिया कहा कि द्रविड़ आर्यों के भारत में आक्रमण से पूर्व उत्तर भारत में ही निवास करते थे आर्यों ने उन पर हमला कर उन्हें विंध्य के पार समुंद्र तटीय दक्षिण भारत की ओर धकेल दिया खुद उत्तर मध्य भारत पर शासन करने लगे| अंग्रेज इतिहासकारों के बाद भारत में आर्यों को आक्रांता विदेशी सिद्ध करने का बीड़ा वामपंथी भारतीय इतिहासकारों ने उठा लिया | एसएसटी, इतिहास  से संबंधित एनसीईआरटी की किताबों में तो  यदा-कदा आज भी आर्यों को विदेशी आक्रांता ही बताया जा रहा है इनकी चतुराई तो देखिए आर्यों को एक स्वर में विदेशी मानते हुए उनके उत्पत्ति स्थान पर सब भिन्न-भिन्न राय यह वामपंथी इतिहासकार देते है कोई कहता है आर्य इरान से आए तो कोई मध्य एशिया तो कोई पश्चिम एशिया तो कोई यूरोप से आर्यों के आगमन के सिद्धांत को बताता|

अंग्रेजों ने यह झूठा जहरीला सिद्धांत हम पर शासन करने के लिए दिया कोई भी शासक अपने दास को अपने से श्रेष्ठ कैसे मान सकता है ?हमारी सांस्कृतिक एकता को तोड़ने के लिए अर्थात हम भी विदेशी तो तुम भी विदेशी  सिद्धांत के तहत यह सिद्धांत झूठ प्रचारित किया गया|

वामपंथी अपनी आदत से लाचार होकर बेशर्मी से इस झूठे जहरीले सिद्धांत पर आज भी अड़े हुए हैं... मंदबुद्धि बौद्ध तथाकथित दलितों के मसीहा के  कहलाने वाले संगठन स्वार्थ की गंगा में हाथ बहा रहे हैं... अपनी खुन्नस को निकालने के लिए.... वह  मूलनिवासी मूलनिवासी गाते रहते हैं....

 मैक्स मूलर जैसे कुटिल स्वघोषित संस्कृत के पंडित उसी की जमात के अंग्रेज जर्मन इतिहासकार के गाल पर सबसे पहला करारा तमाचा 19वीं शताब्दी के धार्मिक वैचारिक क्रांतिकारी संगठन आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती ने लगाया उन्होंने कहा आर्य विदेशी नहीं है कोई  नस्ल नहीं है और  वह प्रत्येक मनुष्य  आर्य है जो श्रेष्ठ है आर्य गुणवाचक शब्द है भारतवर्ष का प्राचीन नाम आर्यव्रत था हमारे पूर्वज ने पूरी दुनिया में सर्वोत्तम जान इसे  बसाया | हमारे पूर्वज आर्य  सृष्टि की आदि से ही से ही इस भूभाग पर शासन करते आए हैं| जब आर्यवृत्त की स्थापना हुई तब संसार के अन्य किसी भूभाग पर मनुष्य का निवास नहीं था | ऐसे में यह प्रश्न ही नहीं उठता कि दुनिया के अन्य किसी भूभाग से मनुष्य चलकर भारत भूमि पर आए... अपितु हमारे पूर्वज  आर्यों ने ही अन्य भूखंडों  दीप  को ज्ञान कला कौशल संस्कृति से आबाद किया|

 पश्चिमी ,वामपंथी इतिहासकार कहते हैं सिंधु घाटी सभ्यता जिसे हड़प्पा सभ्यता भी कहते हैं आर्य वैदिक सभ्यता से प्राचीन है... आर्यों ने सिंधु घाटी सभ्यता को नष्ट कर दिया...... पहले सिंधु घाटी सभ्यता को 4000 वर्ष प्राचीन बताते थे अब यह सिद्ध हो गया है सिंधु घाटी सभ्यता कम से कम 9000 वर्ष प्राचीन है..... महाभारत को घटित हुए लगभग 5000 वर्ष हो चुके हैं... महाभारत ग्रंथ   में कहीं भी किसी अन्य सभ्यता का जिक्र नहीं है सनातन वैदिक आचार आर्य संस्कृति का ही बखान है ऐसे में यदि कोई अन्य  समानांतर  सिंधु घाटी/ हड़प्पा सभ्यता होती तो उसका उल्लेख जरूर होता सच्चाई तो यह है सिंधु घाटी /हड़प्पा सभ्यता आर्य वैदिक सभ्यता ही है|

वाल्मीकि रामायण जो महाभारत से भी हजारों लाखों वर्ष प्राचीन हैं  यह  अलग विषय है कि वामपंथी इतिहासकार Ramayan  ग्रंथ को ईसा पूर्व 600 का लिखित मानते हैं...... उसके किष्किंधा कांड में पंपा सरोवर किष्किंधा नगरी का बड़ा ही सुंदर विस्तृत उल्लेख मिलता है जो कर्नाटक दक्षिण भारतीय राज्य का हिस्सा है.... वहां महाराज सुग्रीव हनुमान अंगद महाराज बाली उसकी पत्नी  तारा को आर्य शब्द से ही संबोधित किया है | रामायण में द्रविड़ शब्द ढूंढने से भी दिखाई नहीं दिखाई देता| वानरों की सभ्यता भी आर्य सभ्यता ही थी बालि का भी विधिवत  वैदिक रीति से अग्नि संस्कार हुआ... दक्षिण भारत की आर्य सभ्यता कला कौशल में उत्तर भारत की आर्य सभ्यता से बढ़ चढ़कर थी..... हनुमान सुग्रीव बाली आदि हमारे पूर्वज भौगोलिक तौर पर दक्षिण भारतीय आर्य थे| दक्षिण भारत का वह इलाका समुद्र  पर्यंत  इक्ष्वाकु वंश के नंदीग्राम  से समस्त भूगोल पर शासन कर रहे चक्रवर्ती सम्राट महाराज भरत के ही अधीन था|
 मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने बाली वध को उचित ठहराते हुए यह बात कही थी| फिर भी समझ से परे है रामायण जैसा ऐतिहासिक दस्तावेजी साक्ष्य होते हुए भी उत्तर व दक्षिण भारतीय में पूरा भारत अंग्रेजों वामपंथियों ने बांट दिया.... इसी कारण हिंदी आज भी राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई......दक्षिण भारत के राजनीतिक  दलो को हिंदी कतई बर्दाश्त नहीं है |

हमारे पूर्वज राम कृष्ण ऋषि मुनि जिनका उल्लेख रामायण महाभारत में मिलता है सभी आर्य थे अर्थात श्रेष्ठ थे|हम सभी उनके वंशज हैं |सभी भारतवासी मौसेरे भाई बहन है | इस पर अनुवांशिक विज्ञान की मुहर लग चुकी है यह दुर्भाग्य है सरकार ने कभी अनुवांशिकी के इतिहास पुरातत्व से संबंधित इस विषय पर किए गए शोधों को सार्वजनिक नहीं किया है|

वर्ष 2010 से लेकर 2017 तक  तमाम शोध पुरातात्विक खुदाई  से मिले कंकालों   उनसे प्राप्त डीएनए पर हुए हैं| वर्ष 2016- 17 में हरियाणा के हिसार के राखी गढ़ी गांव जो  आर्य सभ्यता का प्रमुख केंद्र था... महाभारत कालीन वैदिक भारत  के  योद्धय गणराज्य का हिस्सा था.... 40 मानव कंकाल प्राप्त हुए... इन कंकालों के कान के पास की हड्डी से डीएनए लिए गए... इंडिया ने नमूनों का मिलान... मध्य एशिया अफ्रीका यूरोप के मूल समाज के डीएनए से किया गया.... कोई भी नमूना मैच नहीं हुआ|

फिर इन कंकालों के डीएनए नमूनों का मिलान भारत के ही उत्तर मध्य पूर्वी दक्षिण भारत में रहने वाले विभिन्न 1500 लोगों से लिए गए नमूने नमूनों से किया गया...| नमूना 99 दशमलव 99 फ़ीसदी मैच हो गया| इसका निष्कर्ष निकलता है राखी गढ़ी में दफन मानव अवशेष तथा  आज के आम भारतवासी   जिनका डीएनए नमूना  लिया गया दोनों के पूर्वज एक ही है..| ठीक  ऐसे ही उत्तर प्रदेश के बागपत के सनौली जो महाभारत कालीन हस्तिनापुर का क्षेत्र था वहां से प्राप्त कंकाल से प्राप्त डीएनए नमूनों का मिलान भारत में ही खुदाई से प्राप्त हुए 12000 वर्ष पुराने कंकाल के नमूनों से किया गया नमूना मैच हो गया..|

अनुवांशिक विज्ञान चीख चीख कर कह रहा है उत्तर से लेकर दक्षिण पूर्व से लेकर पश्चिम में बसने वाले भारतीय सभी ऋषि-मुनियों आर्यों की संतान हैं सभी में एक ही रक्त है.... आपको आश्चर्य होगा जिन 15 00लोगों का डीएनए लिया गया था उनमें 200 से अधिक हैदराबाद मुंबई अजमेर मुरादाबाद के मुसलमान भी थे उन सभी का डीएनए मध्य एशिया पश्चिम एशिया पश्चिमी अफ्रीका अरब के मुस्लिम समुदाय से मैच नहीं हुआ अपितु भारतवासी जो गैर मुस्लिम थे उनसे मैच हुआ अर्थात भारतीय मुस्लिमों के पूर्वज  आर्य ही है...............|

इस शोध में निकल कर आया जिसकी अगुवाई भारत के प्रसिद्ध अनुवांशिक वैज्ञानिक जिन्होंने डीएनए टेस्टिंग फिंगर प्रिंटिंग पर उल्लेखनीय कार्य किया दिवंगत डॉक्टर लाल जी सिंह थे.... इस शोध से यह भी निकल कर आया भारत में पिछले 100000 सालों में  निवास करने वाले  भारत वासियों जिनकी उपलब्ध डीएनए सामग्री मिलती है उनके  डीएनए में कोई छेड़छाड़ नहीं हुआ है...|

 भारत के संस्कृति मंत्रालय का दायित्व बनता है वह इस ऐतिहासिक प्रमुख अनुवांशिक शोध को भारत वासियों के सामने प्रस्तुत करें.... आर्यों को लुटेरा विदेशी बताने वाले लोगों की जुबान पर अब ताला लग जाना चाहिए.....|

बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है इस संस्कृति मंत्रालय से हम क्या उम्मीद लगाए? यह तो वामपंथियों  की वैचारिक प्रति छाया है इसका नाम है संस्कृति मंत्रालय के रहते समलैंगिकता adultery भारत में  कानूनी मान्यता हासिल कर गई ...इसने सर्वोच्च  न्यायालय में अपोज तक नहीं किया ...आज भी भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद संस्कृति मंत्रालय से लेकर पुरातत्व विभाग में वामपंथी भेड़िए कुर्सी पर कब्जा जमाए हुए बैठे हुए हैं....| सनातन भारतीय संस्कृति के चारों वर्ण एक ही पिता की संतान है...दुख होता है इनमें से जब एक संतान को विदेशी बताया जाता है | यह सिद्धांत पहले अंग्रेजों ने दिया कि ब्राह्मण विदेशी हैं भारत के मूलनिवासी काले रंग के हैं...गुलामी के कालखंड में  इस जहरीले सिद्धांत का अंधानुकरण ज्योतिबा फुले ने किया उन्होंने एक पुस्तक लिखी गुलामगिरी  अंग्रेजों की भूरी भूरी प्रशंसा की हालांकि अंग्रेजों ने कभी ज्योतिबा फुले को घास नहीं डाली.....ज्योतिबा फुले ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे आठवीं   तक उनका अध्ययन था महाराष्ट्र की संस्कृति में होने वाले कुछ  ढोंग आडंबर का उन्होंने विरोध किया यह तो उचित था | ज्योतिबा फुले की पुस्तक गुलामगिरी पर फिर कभी लिखा जाएगा| मूल प्रसंग की ओर लौटते हैं|

आज तक भारत की किसी भी सरकार ने सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त शिलालेख अभिलेखों में अंकित लिपि के रहस्य से पर्दा उठाने का अकादमी प्रयास नहीं किया है| सरकार भले ही अब राष्ट्रवादी देशभक्त माने जाने वाली भाजपा की हो लेकिन तंत्र अभी वामपंथी ही कार्य कर रहा है| दुनिया के किसी भी लिपि शास्त्री भाषा शास्त्री सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि को नहीं पढ़ पाए हैं यह भी एक सोचा समझा षड्यंत्र.... जब दुनिया की 3000 से अधिक लिपि पढ़ ली गई है तो फिर सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि का ना पढ़ा जाना इस हालात में जब लिपियों को पढ़ने में विकसित कंप्यूटर सॉफ्टवेयर आ गए हैं एक सोचे समझे षड्यंत्र का हिस्सा है.... वामपंथी इतिहासकार कभी नहीं चाहते कि सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि के रहस्य से पर्दा उठ जाए फिर उनका झूठ एक बार फिर बेनकाब हो जाएगा...... पश्चिम इतिहासकार तथा वामपंथी इतिहासकार सिंधु घाटी सभ्यता को आर्य वैदिक सभ्यता के प्राचीन बताते हैं.... सच्चाई तो यह है सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि में  अंकित लेख है वह वेद व रामायण महाभारत मनुस्मृति के चुनिंदा  उपदेश ही हैं..... सिंधु घाटी या हड़प्पा वैदिक आर्य सभ्यता ही है.........................|

कुछ लोग कहते हैं सत्य परेशान होता है पराजित नहीं होता हम कहते हैं सत्य कभी परेशान होता ही नहीं है और ना ही  पराजित होता है |सत्य ,आडंबर षड्यंत्र से छुपाया जा सकता है लेकिन सत्य उद्घाटित होकर ही रहता है चाहे विज्ञान से हो या जनश्रुति  आस्था से..................|
आनुवंशिक विज्ञान ने तो यह भली-भांति सिद्ध कर दिया है आर्य द्रविड़ सिद्धांत के मामले में....

 🙏साभार🙏
---राज_सिंह---

वयाच्या पंचविशीत कशाला हवं प्लॅनिंग?..

माझा मुलगा २५ वर्षांचा आहे. कमावता आहे. पगार चांगला, त्याला गुंतवणूक सल्ला काय देऊ, असा प्रश्न विचारणारा एका वडिलांचा मेल आला. (हे प्रश्न पंचविशीच्या मुलांना पडले तर मला जास्त आनंद होईला) तर त्याचं हे उत्तर सोपं सांगतो, क्रिकेटचा नियम, तुम्ही ओपनर असाल तर तुम्हाला जास्त ओव्हर्स खेळायला मिळतात. बेंटिंगचं प्रेशर कमी असतं, उचलून मारता येतं. समजा, गेलीच विकेट तर नंतर येणारे खेळाडू मॅच नेऊ शकतात, ढुकुटुकूचं प्रेशर नसतं.

तेच गुंतवणुकीच्या बाबतीत. तुम्ही जितक्या लवकर गुंतवणूक सुरू कराल तितकं तुमच्यावरचं प्रेशर कमी, ताण कमी, संधी जास्त धोके पत्करण्याची शक्यता जास्त चुकलं काही तर दुरुस्त करता येतं. त्यामुळे नियम एकच साधा सोपा, स्टार्ट अल. त्यासाठी काय करता येईल?

१. थोड़े, पण नियमित- तरुण आहात, हातात खर्चायला जास्त पैसे असावेत असं वाटणं साहजिक आहे. त्यामुळे जी काही रक्कम गुंतवायची ठरवाल ती अंदाज घेऊन ठरवा, त्यात सातत्य ठेवा. सातत्य ठेवलं तरच स्कोअर मोठा होतो.

२. कमी रक्कम पण वर्षे जास्त अनेक तरुणांना वाटतं की आपल्याला पगार कमी, त्यातून आपण फार कमी रक्कम गुंतविणार मग काय उपायोग, पगार वाढला की पाहू हे साफ चूक. कमी रक्कम असेल तरी चालेल, तुमच्या हातात वर्षे जास्त आहेत. रक्कम कमी तर कमी, पण गुंतवा नियमित, जास्त वर्षे,

३. रिटायरमेंटचं काय?- वय २४ पण नाही आणि रिटायरमेंटचं काय सांगता, असं जर तुम्हाला वाटत असेल
तर ते चूक, खासगी नोकरी करणाऱ्यांनी आपल्या निवृत्तीनंतरच्या पैशाचं नियोजन नोकरी लागल्याच्या पहिल्या दिवसापासूनच करायला हवे.

४. तुमचं लक्ष्य काय? म्हणजे तुम्हाला अजून उच्च शिक्षण घ्यायचं आहे. करिअर बदलायचं आहे. स्वतःचं लग्न, कार, घर, घरातल्या अन्य जबाबदाऱ्या यासाठीच्या पैशाचं नियोजन करा, त्याप्रमाणे वचत गुंतवणूक करा. हे जमलं तरच तुमचे छोटे आणि मोठे आर्थिक उद्दिष्ट पूर्ण होतील आणि आपण कमावत असलेल्या पैशातून काहीतरी खऱ्या अर्थाने कमावलं असं वाटेल. आता अजून एक मोठा मंत्र म्हणजे 'जस्ट डू इट' लोक फिनांशियल प्लॅनिंगविषयी बोलतात खूप करीत काहीच नाहीत. त्यामुळे छोट का होईन, पण सुरू करा, 'जस्ट डू इट' हे विसरू नका.

19 मे

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