शनिवार, २७ सप्टेंबर, २०२५

आज नवयुवकों की एक बड़ी संख्या ईश्वर-विश्वासी नहीं है। स्रोत- महात्मा आनन्दस्वामी जी का प्रवचनप्रस्तुतकर्ता - रामयतन

💥 ईश्वर की सत्ता पर भांति-भांति के प्रश्न 💥
" एक पिता हिरण्यकश्यप और पुत्र प्रहलाद जैसा "

एक पिता था हिरण्यकश्यप जैसा और पुत्र था प्रह्लाद जैसा अर्थात् पुत्र तो आस्तिक तथा पिता नास्तिक था। पुत्र बार-बार पिता से कहता कि नास्तिक बनना अच्छा नहीं, इससे कृतघ्नता का दोष लगता है। हमें अपनी उत्पत्ति,पालन, पोषण और निर्वाह में सहायक सभी का कृतज्ञ होना चाहिए। 
परन्तु पिता यही उत्तर देता कि तू हमसे जन्मा है अथवा हम तुमसे पैदा हुए हैं? तू हमें क्या सिखाएगा ? मूढ़ लोगों के पास बस यही युक्ति है।

एक दिन पुत्र ने साहस किया कि चाहे कुछ भी हो, हमारा कर्तव्य है कि पिता की नास्तिकता दूर करना चाहिए।

यह दृढ़ निश्चय करके पुत्र ने यह कार्य किया कि जहाँ पिताजी बैठा करते थे वहाँ एक सुन्दर, मनोहारी चित्र बनाकर दीवार पर लगा दिया। पिताजी आये और उनकी दृष्टि जब उस चित्र पर पड़ी तो उन्होंने प्रसन्न होकर पूछा- ये चित्र किस चित्रकार ने बनाया ? 
• पुत्र ने कहा- पिताजी, आलमारी के ऊपर से रोल के कागज आकर मेज पर फैल गये। फिर अलमारी में से विभिन्न रंगों के डिब्बे मेज पर आप पड़े। त्यों ही ब्रश भी आ गया और रंगों के डिब्बों के मुंह खुल गये। फिर ब्रश ने उचक उचक कर कागज पर ये सुन्दर चित्र बना दिये।

•पिताजी बोले- ऐसा कैसे हो सकता है ? बिना किसी के बनाये कैसे बन सकता है? अवश्य किसी दक्ष चित्रकार ने बनाया है। उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। 

•पुत्र बोला-पिताजी इस छोटे से पत्र पर इतनी सुन्दर रचना के लिए रचनाकार की अपेक्षा है तो क्या जगती तल- विश्व पटल पर परम सुन्दर,विचित्र दृश्य बिना किसी रचनाकार के बने हैं? क्या यह बुद्धिसंगत और तर्कसंगत है? पिताजी ऐसा सोचना अन्तःकरण चतुष्टय का दुरुपयोग है। कृतघ्नता दोष है। पिता को अपनी भूल समझ में आ गई।

पिता प्रसन्न हो गये और बालक को आशीर्वाद दिया।

"आज नवयुवकों की एक बड़ी संख्या ईश्वर-विश्वासी नहीं है।" 

स्रोत- महात्मा आनन्दस्वामी जी का प्रवचन
प्रस्तुतकर्ता - रामयतन

● खोट्या गुरूंपासून सावध रहा! ●● "अशा गुरू आणि शिष्यांवर धिक्कार असो!" ● * महर्षी दयानंद सरस्वती


प्रश्न:
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ - 'गुरु हे ब्रह्मा आहेत, गुरु हे विष्णू आहेत, गुरु हे परमेश्वर आहेत, गुरु हे परब्रह्म (महान ईश्वर) आहेत; म्हणून, त्या श्रीगुरूला माझा नमस्कार असो.' - अशा प्रकारची गुरु-पूजा योग्य आहे का? त्याचे पाय धुतलेले पाणी पिणे, सर्व गोष्टींमध्ये त्याचे आज्ञापालन करणे, जर तो लोभी असेल तर त्याला वामन (देवाचा अवतार) मानणे, जर तो क्रोधी असेल तर त्याला नृसिंह (अर्धा मनुष्य आणि अर्धा सिंह - देवाचा अवतार) मानणे, जर तो ऐहिक गोष्टींमध्ये आसक्त असेल तर त्याला राम मानणे, जर तो विषयी असेल तर त्याला कृष्ण मानणे, त्याने कोणताही पाप केला तरी त्याच्यावरची श्रद्धा न गमावणे, आणि आपल्या गुरूला किंवा संताला (तथाकथित पवित्र व्यक्तीला) भेटायला जाण्यासाठी टाकलेले प्रत्येक पाऊल अश्वमेध यज्ञाच्या (यज्ञाचा एक प्रकार) बरोबरीचे पुण्य देणारे आहे असे मानणे योग्य आहे का?
उत्तर:
नाही, हे योग्य नाही. ब्रह्मा, विष्णू, महेश्वर आणि परब्रह्म ही सर्व देवाची नावे आहेत, गुरु कधीही त्याच्या समान होऊ शकत नाही. हे वचन ज्या ग्रंथातून (गुरुची महान पवित्रता शिकवणारा) घेतले आहे, त्या गुरु-गीता नावाच्या ग्रंथाची रचना कोणत्याही पोपसारख्या माणसाने केली असावी. हे अत्यंत पोपशाही पद्धती शिकवते.
खरे गुरु म्हणजे आपले वडील, आई, शिक्षक आणि अतिथी (निस्वार्थी शिक्षक) हे आहेत. त्यांची सेवा करणे आणि त्यांच्याकडून ज्ञान आणि संस्कृती आत्मसात करणे हे मुलांचे आणि शिष्यांचे कर्तव्य आहे. पण जर गुरु लोभी, विषयी किंवा वाईट स्वभावाचा असेल, तर अशा लोकांना (म्हणजे तथाकथित गुरु किंवा पवित्र लोक) सोडून द्यावे. (परंतु राजाचे हे कर्तव्य आहे की) अशा लोकांना प्रथम हळूवारपणे समजावून सांगावे, जर ते तरीही ऐकत नसतील, तर त्यांना शारीरिक शिक्षा करावी किंवा त्यांना ठार देखील मारावे. त्यांना शिक्षा करण्यात काहीही गैर नाही. असे लोक केवळ विद्वत्ता आणि इतर चांगले गुण असल्याने गुरु बनत नाहीत.
जे खोटे गुरु आपल्या भोळ्या शिष्यांच्या गळ्यात मण्यांच्या माळा घालतात, त्यांच्या कपाळावर टिळे लावतात आणि वेदांच्या शिकवणीच्या पूर्णपणे विरुद्ध मंत्रादी (गूढ शब्द) शिकवतात, ते खोटे गुरु आहेत.
ते गुरु नसून मेंढपाळ आहेत. कारण, जसे मेंढपाळ दूध वगैरे मिळवण्यासाठी शेळ्या-मेंढ्या पाळतात, तसेच हे तथाकथित गुरु आपल्या पुरुष आणि स्त्री शिष्यांना (चेले आणि चेली) त्यांचे पैसे लुटून स्वतः मजा करण्यासाठी ठेवतात. त्यांच्याबद्दल कोणीतरी म्हटले आहे: गुरु लोभी चेला लालची, दोनों खेलें दाव। भवसागर में डूबते, बैठ पत्थर की नाव॥ - 'लोभी गुरु आणि लालची शिष्य दोघेही एकमेकांशी युक्त्या खेळतात. ते (जसे दगडाच्या बोटीत बसून समुद्र पार करू इच्छिणारे) दुःखाच्या सागरात बुडून जातात.'
गुरुला वाटते की त्याचे पुरुष आणि स्त्री शिष्य त्याला काहीतरी देतीलच, तर शिष्यांना वाटते की गुरुचा दुसरा कोणताही उपयोग नसेल तरी तो (खोटी) शपथ घेण्यासाठी किंवा पापांतून मुक्ती मिळवण्यासाठी पुरेसा चांगला आहे. ते दोघेही स्वार्थी आणि ढोंगीपणाचे मूर्तिमंत रूप आहेत. दगडाच्या बोटीत बसून समुद्र पार करू पाहणाऱ्यांप्रमाणे ते या जगात दुःखाच्या महासागरात बुडून जातात. अशा गुरु आणि शिष्यांवर धिक्कार असो. कोणीही अशा लोकांशी संबंध ठेवू नये, जो कोणी ठेवेल तो दुःखाच्या सर्वात मोठ्या गर्तेत जाईल.
या मेंढपाळ गुरुंचा ढोंग पौराणिकांच्या पुजाऱ्यांसारखाच आहे. ते अत्यंत स्वार्थी लोक आहेत. ज्यांच्या मनात लोकांचे भले करण्याची भावना असते, त्यांना स्वतःला कष्ट सहन करावे लागतील, पण ते जगासाठी चांगले करणे कधीही थांबवत नाहीत. गुरु-माहात्म्य (गुरुच्या व्यक्तीच्या पवित्रतेचे मत) आणि गुरु-गीता या दोन्ही या अनैतिक, दुष्ट गुरुंच्या कल्पना आहेत.
[स्रोत: सत्यप्रकाश, महर्षी दयानंद सरस्वती यांचे मूळ लेखन, अध्याय: ११. अनुवादक: डॉ. चिरंजीव भारद्वाज, सादरकर्ते: भावेश मेरजा]

या विषयावर अधिक माहितीसाठी, तुम्ही सत्यार्थ प्रकाश - एकादश समुल्लास या व्हिडिओला भेट देऊ शकता.
https://youtu.be/VBxe8cB1sS8?si=MGA4WTTfkccQJNnU

सनातन शब्द की व्याख्या = पंडित गंगा प्रसाद उपाध्याय


'सनातन' शब्द का अर्थ है 'सदा एक सा रहने वाला'। इसीलिये ईश्वर को भी 'सनातन' कहते हैं। सनातन धर्म का अर्थ है वह धर्म या नियम जो कभी बदलें नहीं, सदा एक से रहे। अथर्ववेद में 'सनातन' शब्द का यह अर्थ किया गया है :-
"सनातनमेनमाहुरताद्य स्यात् पुनर्गवः ।
अहो रात्रे प्रजायते अन्यो अन्यस्य रूपयोः ॥"
(अथर्व वेद १०। ८ । २३)
सनातन उसको कहते हैं जो कभी पुराना न हो सदा नया रहे। जैसे रात दिन का चक्र सदा नया रहता है। इसके कुछ उदाहरण लीजिये। जो नियम सदा एक से रहें वे सनातन हैं। जैसे दो और दो चार होते हैं, यह सनातन धर्म है। क्योंकि किसी युग में या किसी देश में यह बदल नहीं सकता। एक त्रिभुज की दो भुजायें मिलकर तीसरी भुजा से बड़ी होती है या एक त्रिभुज के तीनों कोण मिलकर दो समकोणों के बराबर होते हैं, यह सब सनातन धर्म है।
धर्म या नियम दो प्रकार के होते हैं एक सनातन और दूसरे सामयिक ! सनातन बदलता नहीं। सामयिक बदलता है। जैसे जाड़े मे गर्म कपड़ा पहनना चाहिये। या ज्वर आने पर दवा खानी चाहिये। भोजन करना सनातन धर्म है क्योंकि किसी युग में भी बिना भोजन के शरीर की रक्षा नहीं हो सकती। लेकिन दवा खाना सनातन धर्म नहीं। यह तो कभी बीमार होने पर ही काम में आता है।
धर्म के दो रूप होते हैं। एक तो मूल तत्व जो सदा एक से रहते है और दूसरी रस्मो रिवाज (Ceremonials) जो देश और काल के विचार से बदलते रहते हैं। जैसे किस समय कैसे कपड़े पहनना। यह रिवाज के अनुकूल होता है। यह धर्म का मुख्य अंग नहीं है।
बहुत से लोग मौलिक या असली धर्म और रिवाज या सामयिक धर्म को मिला कर गड़बड़ कर देते हैं। इसलिए बहुत सा भ्रम उत्पन्न हो जाता है।
आजकल भारतवर्ष में जिसको सनातन धर्म' कहते हैं उसमें बहुत से रस्मो रिवाज पीछे से मिल गये हैं। जैसे शुद्ध पानी दूर तक बहते बहते गदला हो जाता है इसी प्रकार सनातन धर्म का हाल है। इसमें कुछ तो भाग सनातन है और कुछ पीछे की मिलावट है। सब को सनातन धर्म कहना भूल है ।
स्वामी दयानन्द ने जिस धर्म का प्रचार किया है वह शुद्ध सनातन वैदिक धर्म है । इस प्रकार आर्य समाज भी सनातन धर्म को मानता है ।उसमें और सनातन कहलाने वालों में कुछ भेद नहीं है। सब सनातन धर्मी वेदों को मानते हैं। आर्य समाजी भी वेदों को मानते हैं। महाभारत, रामायण, मनुस्मृति, गीता आदि शास्त्रों में वेदों की महिमा पाई जाती है। यह पुस्तकें आर्य समाज के भी आदर का पात्र हैं ! इसलिये आर्य समाज और सनातन धर्म के मूल तत्वों में कोई भेद भाव नहीं होना चाहिये। और बुद्धिमान लोग ऐसा ही मानते हैं। कुछ निर्बुद्धि लोग रस्म रिवाज के भेद को बढ़ाकर परम्पर द्वेष फैलाना चाहते हैं। यह ठीक नहीं। धर्म में बहुत सी बातें पीछे से मिला दी गई हैं, उनको छोड़ देना चाहिये। जैसे गंगाजल गंगोत्तरी पर शुद्ध और पवित्र होता है परन्तु हुगली नदी तक पहुँचते पहुँचते गदला हो जाता है। उसको छान कर मिट्टी निकाल देनी चाहिये इसी प्रकार पुराने वैदिक धर्म में जो गड़बड़ पीछे से मिला दी गई है उसको भी आज शुद्ध करने की जरूरत है।
--पं गंगा प्रसाद उपाध्याय

वेद ही ईश्वरीय ध्यान है

वेद ही ईश्वरीय ज्ञान क्यों है?

#डॉ_विवेक_आर्य 

ईश्वरीय ज्ञान के सम्बन्ध में एक प्रश्न सामने आता है कि भिन्न-भिन्न मत के लोग अपनी अपनी धार्मिक पुस्तकों को ईश्वरीय ज्ञान बतलाते है। जैसे ईसाई मत वाले बाइबल को, इस्लाम मत वाले कुरान को, पारसी मत वाले जेन अवेस्ता को और हिन्दू वेद को आदि आदि। ऐसी अवस्था में किसको ईश्वरीय ज्ञान माना जाये और किसको नहीं माना जाये। इसका प्रश्न का उत्तर ये हैं की सर्वप्रथम तो किसी भी मत की धर्म पुस्तक को उसके अनुनायियों के दावे मात्र से ईश्वरीय ज्ञान नहीं माना जा सकता। हमे उसके दावे की परीक्षा करनी होगी। उसे कुछ कसौटियों पर परखा जाये? जो भी धर्म पुस्तक उन कसौटियों पर खरी उतरे, उस पुस्तक को हम ईश्वरीय ग्रन्थ मान लेंगे अन्यथा वह मनुष्य कृत समझी जाएगी।

1. ईश्वरीय ज्ञान सृष्टी के आरंभ में आना चाहिये न की मानव की उत्पत्ति के हजारों वर्षों के बाद

परमेश्वर सकल मानव जाति के परम पिता हैं और सभी मनुष्यों का कल्याण चाहते हैं। केवल एक वेद ही हैं जो सृष्टी के आरंभ में ईश्वर द्वारा मानव जाति को प्रदान किया गया था। बाइबल 2000 वर्ष के करीब पुराना हैं, कुरान 1400 वर्ष के करीब पुराना हैं, जेंद अवस्ता 4000 वर्ष के करीब पुराना है। इसी प्रकार अन्य धर्म ग्रन्थ हैं। मानव सृष्टी की रचना कई करोड़ वर्ष पुरानी हैं जबकि आधुनिक विज्ञान के अनुसार केवल कुछ हज़ार वर्ष पहले मानव की विकासवाद द्वारा उत्पत्ति हुई हैं। जब पहले पहल सृष्टी हुई तो मनुष्य बिना कुछ सिखाये कुछ भी सीख नहीं सकता था। इसलिए मनुष्य की उत्पत्ति के तुरंत बाद उसे ईश्वरीय ज्ञान की आवश्यकता थी। सत्य के परिज्ञान न होने के कारण यदि सृष्टी के आदि काल में मनुष्य कोई अधर्म आचरण करता तो उसका फल उसे क्यूँ मिलता क्यूंकि इस अधर्माचरण में उसका कोई दोष नहीं होता, क्यूंकि अगर किसी का दोष होता भी हैं, तो वह परमेश्वर का होता क्यूंकि उन्होंने मानव को आरंभ में ही सत्य का ज्ञान नहीं करवाया।
(नोट 1- ऊपर लिखे तर्क से बाइबल में वर्णित आदम और हव्वा के किस्से की अगर हम परीक्षा करे तो परमेश्वर द्वारा पहले सत्य के फल का वृक्ष लगाना, फिर आदम और हव्वा की उत्पत्ति कर उन्हें वृक्ष के फल खाने से मना करना, फिर हव्वा द्वारा साँप की बातों में आकर वृक्ष के फल खाना जिससे उसे ज्ञान होना की वे वस्त्र रहित हैं। इससे परमेश्वर का नाराज होकर हव्वा को पापी कहना, उसे प्रसव पीड़ा का शाप देना और साँप को जीवन भर रेंगने का शाप देना अविश्वसनीय प्रतीत होते हैं, क्यूंकि ईश्वर का कार्य ही मनुष्य को ज्ञान देना हैं और अगर मनुष्य की उत्पत्ति होने के बाद उसे ज्ञान न देकर उसके स्थान पर शाप देना बाइबल के ईश्वरीय पुस्तक होने में संदेह उत्पन्न करता हैं।)

हमारे कथन की पुष्टि मेक्स मूलर महोदय (MaxMuller) ने अपनी पुस्तक धर्म विज्ञान (Science of Religion) में कहा है कि “यदि आकाश और धरती का रचियता कोई ईश्वर है, तो उसके लिए यह अन्याय की बात होगी की वह मूसा से लाखों वर्ष पूर्व जन्मी आत्माओं को अपने ज्ञान से वंचित रखे। तर्क और धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन दोनों बलपूर्वक कहते हैं की परमेश्वर मानव सृष्टी के आरंभ में ही अपना ईश्वरीय ज्ञान मनुष्यों को देता था “
वेद के अतिरिक्त अन्य कोई भी धर्म पुस्तक सृष्टी के आरंभ में नहीं हुई थी। अत: वेद को ही इस कसौटी के अनुसार ईश्वरीय ज्ञान माना जा सकता है अन्य को नहीं।

2. ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक में किसी देश का भूगोल और इतिहास नहीं होना चाहिए।

ईश्वरीय ज्ञान की धर्म पुस्तक संपूर्ण मानव जाति के लिए होनी चाहिए नाकि किसी एक विशेष देश के भूगोल या इतिहास से सम्बंधित होनी चाहिए। अगर कुरान का अवलोकन करे तो हम पाते है कि विशेष रूप से अरब देश के भूगोल और मुहम्मद साहिब के जीवन चरित्र पर केन्द्रित हैं, जबकि अगर हम बाइबल का अवलोकन करे तो विशेष रूप से फिलिस्तीन (Palestine) देश के भूगोल और यहुदिओं (Jews) के जीवन पर केन्द्रित हैं, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वर ने कुरान की रचना अरब देश के लिए और बाइबल की रचना फिलिस्तीन देश के लिए की हैं। वेद में किसी भी देश विशेष या जाति विशेष के अथवा व्यक्ति विशेष के लाभ के लिए नहीं लिखा गया हैं, अपितु उनका प्रकाश तो सकल मानव जाति के लिए हुआ हैं। अत: केवल वेद को ही ईश्वरीय ज्ञान माना जा सकता हैं। पाश्चात्य विद्वान और कुछ भारतीय विद्वान जो वेदों में इतिहास होने की कल्पना करते हैं का कथन वेदों की सही प्रकार से परिभाषा न समझ पाने के करण हैं। इतिहास तो तब बनता है जब कोई समय या काल गूजर चूका होता है। वेद की उत्पत्ति तो सृष्टी के आदि में हुई थी इसलिए उससे पहले किसी इतिहास के होने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए वेद ही ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक हैं क्यूंकि उनमें किसी देश का भूगोल और इतिहास नहीं हैं। 

3. ईश्वरीय ज्ञान किसी देश विशेष की भाषा में नहीं आना चाहिए।

ईश्वरीय ज्ञान मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए दिया गया हैं, अत: उसका प्रकाश किसी देश विशेष की भाषा में नहीं होना चाहिए। किसी देश विशेष की भाषा में होने से केवल वे ही देश उसका लाभ उठा सकेगे, अन्य को उसका लाभ नहीं मिलेगा। कुरान अरबी में हैं और बाइबल इब्रानी (Hebrew) में हैं जबकि वेदों की भाषा वैदिक संस्कृत हैं जो की सृष्टी की प्रथम भाषा हैं और सृष्टी की उत्पत्ति के समय किसी भी भाषा का अस्तित्व नहीं था तब वेदों का उद्भव वैदिक भाषा में हुआ जो की पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणियों की सांझी भाषा थी।कालांतर में संसार की सभी भाषाएँ संस्कृत भाषा से ही अपभ्रंश होकर निकली हैं. स्वामी दयानंद सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास में इसी विचार को इस प्रकार प्रकट करते हैं “जो किसी देशभाषा में करता तो ईश्वर पक्षपाती हो जाता, क्यूंकि जिस देश की भाषा में प्रकाश करता उसको सुगमता और विदेशियों को कठिनता वेदों के पढने-पढ़ाने की होती। इसलिए संस्कृत में ही प्रकाश किया जो की किसी देश की भाषा नहीं थी। उसी में वेदों का प्रकाश किया। जैसे ईश्वर की पृथ्वी आदि सृष्टी सब देश और देशवालों के लिए एक सी हैं वैसे ही परमेश्वर की विद्या की भाषा भी एक सी होनी चाहिए जिससे सब देश वालों को पढने पढ़ाने में तुल्य परिश्रम होने से ईश्वर पक्षपाती सिद्ध नहीं होते और सब विद्ययों का कारण भी हैं “इसलिए संसार की वैदिक भाषा संस्कृत में प्रकाशित होने के कारण भी वेद ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक हैं।

4. ईश्वरीय ज्ञान को बार बार बदलने की आवश्यकता या परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

ईश्वर पूर्ण और सर्वज्ञ है। उनके किसी भी काम में त्रुटी अथवा कमी नहीं हो सकती। वे अपनी सृष्टी में जो भी रचना करते हैं उसे भली भांति विचार कर करते हैं और फिर उसमें परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। जिस प्रकार ईश्वर नें सृष्टी के आरंभ में प्राणीमात्र के कल्याण के लिए सूर्य और चंद्रमा आदि की रचना करी जिनमें किसी भी प्रकार के परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं हैं, उसी प्रकार परमात्मा का ज्ञान भी पूर्ण हैं उसमे भी किसी भी प्रकार के परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं हैं। धर्म ग्रंथों में बाइबल में कई स्थानों पर ऐसा वर्णन आता है कि परमेश्वर ने अपनी भूल के लिए पश्चाताप किया। बाइबल में भिन्न भिन्न पर ऐसा वर्णन आता है कि परमेश्वर ने अपनी भूल के लिए पश्चाताप किया। बाइबल के विषय में यह भी आता है कि बाइबल के भिन्न भिन्न भाग भिन्न भिन्न समयों पर आसमान से उतरे। इसी प्रकार मुस्लमान अभी तक ये मानते है कि ईश्वर ने पहले जबूर, तौरेत, इंजील के ज्ञान प्रकाशित करे फिर इनको निरस्त कर दिया और अंत में ईश्वर का सच्चा और अंतिम पैगाम कुरान का प्रकाश हुआ। जबसे मेक्स-मूलर का यह कथन की संसार की सबसे प्राचीन पुस्तक ऋग्वेद है प्रचलित हुआ है तबसे मुसलमानों (विशेषकर डॉ जाकिर नाइक) ने वेद को जबूर के भी पूर्व की इल्हामी पुस्तक कहना शुरू कर दिया हैं। इन सबसे यही प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या ईश्वर पूर्ण और सर्वज्ञ नहीं हैं जो वे मानव जाति के उद्भव के समय में ही पूर्ण और सत्य ज्ञान नहीं दे सकते। परमात्मा को पूर्ण और अज्ञानी मनुष्यों की भांति क्यों अपनी बात को बार बार बदलने की आवश्यकता पड़ती हैं। बाइबल २००० वर्ष पहले और कुरान १४०० वर्ष पहले प्रकाश में आया इसका मतलब जो मनुष्य 2000 वर्ष पहले जन्म ले चुके थे वे तो ईश्वर के ज्ञान से अनभिज्ञ ही रह गए और इस अनभिज्ञता के कारण अगर उन्होंने कोई पाप कर्म कर भी दिया तो उसका दंड किसे मिलना चाहिए। ईश्वर का केवल एक ही ज्ञान है। वेद जोकि सृष्टी की आदि में दिया गया था और जिसमे परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं है क्यूंकि वेद पूर्ण है और सृष्टी के आदि से अंत तक मानव जाति का मार्गदर्शन करते रहेगे। जैसे ईश्वर अनादी है उसी प्रकार ईश्वर का ज्ञान वेद भी अनादी है। वेद के किसी भी सिद्धांत को बदलने की आवश्यकता ईश्वर को नहीं हुई इसलिए केवल वेद ही ईश्वरीय ज्ञान है। एक और शंका हमारे मन में आती हैं इस्लाम को मानने वाले कुरान को ईश्वर की अंतिम वाणी (Last and Final) मानते है और यह कहते है कि इस अंतिम सन्देश के बाद ईश्वर की और से और कोई सन्देश नहीं आयेगा। हमारा उनसे एक छोटा सा प्रश्न है कि किस आधार पर वे कुरान को अंतिम उपदेश कह रहे है? जिस आधार पर वे ईश्वरीय ज्ञान को बार बार नवीन करने की बात कर रहे है। ऐसा क्या कारण है कि कुरान के नाज़िल होने के बाद उस ज्ञान को तरोताज़ा करने की आवश्यकता नहीं रहती।

5. ईश्वरीय ज्ञान सृष्टी कर्म के विरूद्ध नहीं होना चाहिए।

ईश्वर सृष्टी के कर्ता है और उनके द्वारा रची सृष्टी में एक निश्चित क्रम पाया जाता है। सर्वत्र एक व्यवस्था और नियम कार्य करता हुआ दिखाई देता है। जैसे सूर्य का पूर्व से निकलना , पश्चिम में अस्त होना, मनुष्य का जन्म लेना और फिर मृत्यु को प्राप्त होना आदि। इतनी विशाल सृष्टी व्यवस्था को चलाने के लिए एक नियम से क्रमबंध किया गया है। जिससे सृष्टी सुचारू रूप से चल सके। अत; ईश्वर द्वारा दिया गया ज्ञान उन नियमों के विपरीत नहीं हो सकता, जो नियम परमात्मा की सृष्टी में चल रहे हैं। जो पुस्तक अपने को ईश्वरीय ज्ञान कहती हैं उसमे भी सृष्टीक्रम के विपरीत, सृष्टी में चल रहे नियमों के विपरीत कोई बात नहीं पानी चाहिए। ईश्वरीय ज्ञान कहलाने वाले बाइबल और कुरान दोनों में ईश्वर के सृष्टीक्रम के विरुद्ध बातें पाई गयी हैं। जैसे बाइबल के अनुसार ईसा मसीह मरियम के पेट से बिना किसी पुरुष के संयोग से ही उत्पन्न हो गए थे। ईसा मसीह ने मुर्दों की जीवित कर दिया था, अंधे को आंखे दे दी और बिना किसी औषधि के बीमारों को दुरुस्त कर दिया था आदि। ऐसे ही कुरान के अनुसार मूसा ने एक पत्थर पर डंडा मारा और उससे पानी के चश्मे बह निकले, मुहम्मद साहिब द्वारा चाँद के दो टुकड़े करना, मुहम्मद साहिब द्वारा एक मुर्दा लड़की को जिन्दा करना आदि। इस प्रकार की ऐसी कोई भी पुस्तक अगर सृष्टी क्रम के विरुद्ध किसी भी चमत्कार को ईश्वर के कार्य अथवा महिमा के रूप में चित्रित करती हैं तो उसे ईश्वरीय ज्ञान नहीं कहना चाहिए। अगर कोई यह कहे की ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं और कुछ भी कर सकता हैं तो वे भी गलत हैं क्यूंकि पहले तो ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं अपितु अज्ञानी कहलायेगा क्योंकि अगर ईश्वर अपने ही बनाये गए नियम को तोड़ते हैं तो ईश्वर सर्वज्ञ घोषित नहीं होते और दुसरे ईश्वर के सर्वशक्तिमान होने का अर्थ यह नहीं है की वे कोई भी कार्य चाहे सृष्टिकर्म के विरुद्ध हो उसे कर सके अपितु जो कार्य ईश्वर के हैं। उन कार्य में जैसे सृष्टी की रचना, जीवन की उत्पत्ति, मानव जाति की जन्म मृत्यु, उनको कर्म के आधार पर फल देना आदि में ईश्वर को किसी की भी सहायता की आवश्यकता नहीं हैं। बाइबल, कुरान आदि पुस्तकों में सृष्टी क्रम के विरुद्ध अनेक बातें जिन्हें चमत्कार के नाम से प्रचारित कर उनका महिमा मंडन किया जाता है। ईश्वरीय ज्ञान नहीं हैं। ईश्वर की सृष्टी और ईश्वर के ज्ञान में प्रतिरोध नहीं होना चाहिए। केवल वेद ही एक मात्र धर्म ग्रन्थ है। जिनमें सृष्टी क्रम के, सृष्टी की व्यवस्था और नियमों के विरुद्ध कोई भी बात नहीं है। इसलिए केवल वेद ही ईश्वरीय ज्ञान है।

6. ईश्वरीय ज्ञान विज्ञान विरुद्ध नहीं होना चाहिए और उसमे विभिन्न विद्या का वर्णन होना चाहिए।

आज विज्ञान का युग हैं। समस्त मानव जाति विज्ञान के अविष्कार के प्रयोगों से लाभान्वित हो रही है। ऐसे में ईश्वरीय ज्ञान भी वही कहलाना चाहिए जो ग्रन्थ विज्ञान के अनुरूप हो। उसमे विद्या का भंडार होना चाहिए। उसमे सभी विद्या का मौलिक सिद्धांत वर्णित हो जिससे मानव जाति का कल्याण होना चाहिए। जिस प्रकार सूर्य सब प्रकार के भौतिक प्रकाश का मूल है। उसी प्रकार ईश्वर का ज्ञान भी विद्यारूपी प्रकाश का मूल होना चाहिए। जो भी धर्म ग्रन्थ विज्ञान विरुद्ध बाते करते हैं वे ईश्वरीय ज्ञान कहलाने के लायक नहीं है। बाइबल को धर्म ग्रन्थ मानने वाले पादरियों ने इसलिए गलिलियो (Galilio) को जेल में डाल दिया था क्योंकि बाइबल के अनुसार सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमता है। ऐसा मानती है जबकि गगिलियो का कथन सही था की पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घुमती है। उसी प्रकार बाइबल के अनुसार सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमता है। ऐसा मानती है जबकि गगिलियो का कथन सही था की पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घुमती है। उसी प्रकार बाइबल में रेखा गणित (Algebra) का वर्णन नहीं है। इसलिए देवी हिओफिया को पादरी सिरिल की आज्ञा से बेईज्ज़त किया गया था क्यूंकि वह रेखा गणित पढाया करती थी। कुरान में इसी प्रकार से अनेक विज्ञान विरुद्ध बाते है जैसे धरती चपटी हैं और स्थिर है जबकि सत्य यह है की धरती गोल है और हमेशा अपनी कक्षा में घुमती रहती है। प्रत्युत वेदों में औषधि ज्ञान (auyrveda), शरीर विज्ञान (anatomy), राजनिति विज्ञान (political science), समाज विज्ञान (social science) , अध्यातम विज्ञान (spritual science), सृष्टी विज्ञान (origin of life) आदि का प्रतिपादन किया गया हैं। आर्यों के सभी दर्शन शास्त्र और आयुर्वेद आदि सभी वैज्ञानिक शास्त्र वेदों को ही अपना आधार मानते हैं। अत: केवल वेद ही ईश्वरीय ज्ञान हैं, अन्य ग्रन्थ नहीं।

7. ईश्वरीय ज्ञान ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव के अनुकूल होना चाहिए।

ईश्वरीय ज्ञान की एक कसौटी है कि उसमें ईश्वर के गुण-कर्म- स्वभाव के विपरीत कोई भी तथ्य नहीं होना चाहिए। ईश्वर सत्यस्वरूप, न्यायकारी, दयालु, पवित्र, शुद्ध-बुद्ध मुक्त स्वभाव, नियंता, सर्वज्ञ आदि गुणों वाला हैं। ईश्वरीय ज्ञान में ईश्वर के इन गुणों के विपरीत बातें नहीं लिखी होनी चाहिए। बाइबल, कुरान आदि धर्म ग्रंथों में कई ऐसी बातें हैं जो की ईश्वर के गुणों के विपरीत हैं। जैसे बाइबल में एक स्थान पर आता हैं की बाइबल के ईश्वर ने भाषा की गड़बड़ इसलिए कर दी ताकि लोग आपस में लड़ते रहे। हमारी शंका हैं की क्या ईश्वर का कार्य लड़वाना है? इसी प्रकार इस्लाम मानने वालों की मान्यता की ईद के दिन निरीह पशु की क़ुरबानी देने से ईश्वर द्वारा पुण्य की प्राप्ति होती ह। ईश्वर के दयालु गुण के विपरीत कर्म है। इस प्रकार की अनेक मान्यताये वेदों को छोड़कर तथाकथित धर्म ग्रन्थ जैसे बाइबल और कुरान आदि में मिलती है। जो ईश्वरीय गुण-कर्म-स्वभाव के अनुकूल नहीं है। इसलिए केवल वेद ही ईश्वरीय गुण-कर्म-स्वभाव के अनुकूल होने के कारण एक मात्र मान्य धर्म ग्रन्थ है।

इस प्रकार इस लेख में दिया गए तर्कों से यह सिद्ध होता हैं वेद ही ईश्वरीय ज्ञान है। अंत में वेदों के ईश्वरीय ज्ञान होने की वेद स्वयं ही अंत साक्षी देते हैं। अनेक मन्त्रों से हम इस बात को सिद्ध करते है। जैसे-

१. सबके पूज्य,सृष्टीकाल में सब कुछ देने वाले और प्रलयकाल में सब कुछ नष्ट कर देने वाले उस परमात्मा से ऋग्वेद उत्पन्न हुआ, सामवेद उत्पन्न हुआ, उसी से अथर्ववेद उत्पन्न हुआ और उसी से यजुर्वेद उत्पन्न हुआ हैं- ऋग्वेद १०.९०.९, यजुर्वेद ३१.७, अथर्ववेद १९.६.१३
२. सृष्टी के आरंभ में वेदवाणी के पति परमात्मा ने पवित्र ऋषियों की आत्मा में अपनी प्रेरणा से विभिन्न पदार्थों का नाम बताने वाली वेदवाणी को प्रकाशित किया- ऋग्वेद १०.७१.१
३. वेदवाणी का पद और अर्थ के सम्बन्ध से प्राप्त होने वाला ज्ञान यज्ञ अर्थात सबके पूजनीय परमात्मा द्वारा प्राप्त होता हैं- ऋग्वेद १०.७१.३
४. मैंने (ईश्वर) ने इस कल्याणकारी वेदवाणी को सब लोगों के कल्याण के लिए दिया हैं- यजुर्वेद २६.२
५. ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद स्कंभ अर्थात सर्वाधार परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं- अथर्ववेद १०.७.२०
६. यथार्थ ज्ञान बताने वाली वेदवाणियों को अपूर्व गुणों वाले स्कंभ नामक परमात्मा ने ही अपनी प्रेरणा से दिया हैं- अथर्ववेद १०.८.३३
७. हे मनुष्यों! तुम्हे सब प्रकार के वर देने वाली यह वेदरूपी माता मैंने प्रस्तुत कर दी हैं- अथर्ववेद १९.७१.१
८. परमात्मा का नाम ही जातवेदा इसलिए हैं की उससे उसका वेदरूपी काव्य उत्पन्न हुआ हैं- अथर्ववेद- ५.११.२.

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गुरुवार, २५ सप्टेंबर, २०२५

श्री धर्मेंद्र प्रधान यांनी देशभरातील शालेय विद्यार्थ्यांमध्ये नवकल्पनांना चालना देण्यासाठी 'विकसित भारत बिल्डथॉन २०२५' या उपक्रमाचा शुभारंभ केला.

 

शिक्षण मंत्रालय


'विकसित भारत बिल्डथॉन २०२५' मुळे नवनिर्मितीच्या पुनर्जागरणाला चालना मिळेल आणि तरुण नवप्रवर्तक आत्मनिर्भर भारताचे चालक म्हणून सक्षम होतील - श्री धर्मेंद्र प्रधान

बिल्डथॉनचा समारोप जानेवारी २०२६ मध्ये होणार, १००० हून अधिक विजेत्यांचे निकाल आणि सत्कार

पोस्ट केल्याची वेळ: २३ सप्टेंबर २०२५, सायंका
ळी ५:२५ वाजता, पीआयबी दिल्ली द्वारे


 


केंद्रीय शिक्षण मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान यांनी आज 'विकसित भारत बिल्डथॉन २०२५' या उपक्रमाचा शुभारंभ केला. ही एक अभूतपूर्व देशव्यापी नवनिर्मिती चळवळ आहे, जी संपूर्ण भारतातील शाळांमधील विद्यार्थ्यांना सहभागी करून घेईल. 'विकसित भारत बिल्डथॉन २०२५' चे आयोजन शिक्षण मंत्रालयाच्या शालेय शिक्षण आणि साक्षरता विभागाने (DoSEL), नीती आयोगाच्या अटल इनोव्हेशन मिशन (AIM) आणि अखिल भारतीय तंत्रशिक्षण परिषदेच्या (AICTE) सहकार्याने केले आहे. या कार्यक्रमादरम्यान, मंत्र्यांच्या हस्ते विकसित भारत बिल्डथॉनचे जिंगल आणि लोगो (बोधचिन्ह) देखील लाँच करण्यात आले.


 

यावेळी शालेय शिक्षण आणि साक्षरता विभागाचे सचिव श्री संजय कुमार; पत्र सूचना कार्यालयाचे प्रधान महासंचालक श्री धीरेंद्र ओझा; AICTE चे अध्यक्ष प्रा. टी. जी. सीताराम; AICTE चे उपाध्यक्ष डॉ. अभय जेरे; नीती आयोगाच्या अटल इनोव्हेशन मिशनचे मिशन संचालक श्री दीपक बागला; शालेय शिक्षण आणि साक्षरता विभागाचे अतिरिक्त सचिव श्री धीरज साहू; तसेच मंत्रालय, केंद्रीय विद्यालय संघटन (KVS) आणि नवोदय विद्यालय समितीचे (NVS) वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित होते.

 


याप्रसंगी बोलताना मंत्री म्हणाले की, आतापर्यंतचा सर्वात मोठा शालेय हॅकेथॉन असलेला 'विकसित भारत बिल्डथॉन', तळागाळातील नवनिर्मितीच्या संस्कृतीला अधिक मजबूत करेल. हा हॅकेथॉन विद्यार्थ्यांना 'व्होकल फॉर लोकल', 'आत्मनिर्भर भारत', 'स्वदेशी' आणि 'समृद्धी' या चार संकल्पनांवर आधारित उत्पादने तयार करण्यास आणि त्यावर विचार करण्यास प्रोत्साहित करेल. ते पुढे म्हणाले की, हा उपक्रम विद्यार्थ्यांच्या नवनवीन शोधांचा उत्सव साजरा करेल, देशात नवनिर्मितीचे पुनर्जागरण घडवेल आणि तरुण पिढी समृद्ध, विकसित आणि आत्मनिर्भर भारताचे प्रमुख वाहक बनेल हे सुनिश्चित करेल.

सचिव श्री संजय कुमार यांनी एक सविस्तर आढावा सादर केला, ज्यातून बिल्डथॉनची रूपरेषा स्पष्ट झाली आणि संपूर्ण भारतात विद्यार्थ्यांच्या नवनिर्मितीला चालना देण्यासाठी त्याचे महत्त्व अधोरेखित झाले.

Information of Viksit Bharat Buildathon 2025 - Watch the video  

बिल्डथॉनची उद्दिष्ट्ये:

  • राष्ट्रीय विकासासाठी सृजनशील विचारांना प्रेरणा देणे.

  • आत्मनिर्भरता आणि शाश्वत विकासाला चालना देणे.

  • शाळांना एका सुसूत्रित नवनिर्मितीच्या उपक्रमात गुंतवणे.

  • संभाव्य जागतिक विक्रमाद्वारे भारताला 'जागतिक नवनिर्मितीची राजधानी' म्हणून स्थापित करणे.

  • तरुण समस्या-निवारकांना राष्ट्रीय आणि जागतिक स्तरावर सन्मानित करणे.

    About Us - Watch the video 

हा उपक्रम 'स्कूल इनोव्हेशन मॅरेथॉन २०२४' च्या यशावर आधारित आहे, ज्यातून 'स्टुडंट इनोव्हेटर प्रोग्राम' (SIP) आणि 'स्टुडंट आंत्रप्रेन्योरशिप प्रोग्राम' (SEP) सारखे कार्यक्रम सुरू झाले. तसेच, अटल टिंकरिंग लॅब्समधून अनेक पेटंट आणि स्टार्टअप उपक्रम उभे राहिले.

'विकसित भारत बिल्डथॉन'ची रूपरेषा:

  • २३ सप्टेंबर: आजपासून 'विकसित भारत बिल्डथॉन'चा प्रवास सुरू होत आहे.

  • २३ सप्टेंबर ते ६ ऑक्टोबर: विद्यार्थ्यांना 'विकसित भारत बिल्डथॉन' पोर्टलवर (https://vbb.mic.gov.in/) नोंदणी करण्यासाठी संधी असेल.

  • ६ ऑक्टोबर ते १३ ऑक्टोबर: शाळांसाठी तयारीचा कालावधी असेल, ज्यात शिक्षक विद्यार्थी संघांना पोर्टलवर नोंदणी प्रक्रियेसाठी मार्गदर्शन करतील. यानंतर विद्यार्थी त्यांच्या कल्पना आणि प्रोटोटाइप (प्रतिकृती) पोर्टलवर सादर करतील.

  • १३ ऑक्टोबर: बिल्डथॉनचा मुख्य भाग, 'थेट सुसूत्रित नवनिर्मिती कार्यक्रम' (Live Synchronized Innovation Event) आयोजित केला जाईल.

  • १३ ऑक्टोबर ते ३१ ऑक्टोबर: कार्यक्रमानंतर विद्यार्थी त्यांच्या अंतिम प्रवेशिका सादर करतील.

  • १ नोव्हेंबर ते ३१ डिसेंबर: तज्ज्ञांची एक समिती दोन महिन्यांच्या कालावधीत सादर केलेल्या प्रवेशिकांचे मूल्यांकन करेल.

  • जानेवारी २०२६: बिल्डथॉनचा समारोप होईल, ज्यामध्ये निकालांची घोषणा केली जाईल आणि १००० हून अधिक विजेत्यांचा सत्कार केला जाईल.

कार्यक्रमात 'विकसित भारत बिल्डथॉन २०२५' च्या संकल्पना आणि उद्दिष्टांवर प्रकाश टाकणारा एक व्हिडिओ देखील प्रदर्शित करण्यात आला.

19 मे

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