भजन नं - १
ओ३म् अनेक बार बोल प्रेम के प्रयोगी ॥
है यही अनादि नाद निर्विकल्प निर्विवाद ।
भूलते ना पूज्य पाद, वीतराग योगी ॥ ओ३म्........
वेद को प्रमाण मान, अर्थ योजना बखान ।
गा रहे गुणी सुजान, साधू स्वर्ग भोगी ||ओ३म्........
ध्यान में घरें विरक्त, भाव में भरें सुभक्त ।
त्यागते अधम अशक्त, पोच पाप रोगी ॥ ओ३म्.......
शंकर आदि नित्य नाम, जो भजे विसार काम ।
तो बने विवेक धाम, मुक्ति क्यों ना होगी । ओ३म्.......
भजन नं - २
ओम् बोल मेरी रसना घड़ी-घड़ी। ओम् बोल........
सकल काम तज, ओ३म् नाम भज, मुखमंडल में पड़ी पड़ी । ओम् बोल...
ओम् नाम सर्वोत्तम प्रभु का, कहे वेद की कड़ी-कड़ी ।
पूरण ब्रम्ह करेंगें पूरण, सब आशाएँ बड़ी-बड़ी ।ओम् बोल.......
पल-पल में ले जाना चाहती, मौत सिरहाने खड़ी खड़ी ।
तन मन से धर व्यापक प्रभु का ध्यान प्रेम में घड़ी-घड़ी ।
मोह ममता तज मनुष्य लगा ले, ओम् नाम की लड़ी-लड़ी। ओम् बोल.......
प्रातः का यह समय सुहाना, ओम् भक्ति का गाओ गाना ।
जल जाए वह वाणी, जो न ओम् जपे ॥
यौवन में जो भजन करेगा, निश्चय वह भव सिन्धु तरेगा।
होगी जीवन-हानि, जो न ओम् जपे,
उसकी व्यर्थ जवानी, जो न ओम् जपे, जल जाए वह वाणी, जो न ओम् जपे ॥
भजन नं - ३
जीवन की घड़िया वृथा न खो,
ओम् जपो, ओम् जपो ।
ओम् ही सुख का सार है, जीवन है जीवन आधार है।
प्रीति न मन से उसको तजो ॥ ओम् जपो...
चोला यही है कर्म का, करने को काम धर्म का।
इसके सिवाय मार्ग न को ॥ ओम् जपो...
मन की गति सम्भालिए, ईश्वर की ओर डालिए।
धोना जो चाहो जीवन को धो । ओम् जपो...
साथी बनाले ओम् को, मन में बिठाले ओम् को।
'देश' रहा क्यों भाग्य को रो॥ ओम् जपो...
भजन नं - ४
मुझमें ओम् तुझमें ओम्, सबमें ओम् समाया ।
सबसे करलो प्यार जगत में, कोई नहीं पराया।
जितने है संसार के प्राणी, सबमें एक ही ज्योति ।
एक बाग के फूल हैं सारे, इक माला के मोती ।
एक ही कारीगर ने सबको, इक माटी से बनाया।
सबसे करलो प्यारं ॥१॥
एक पिता के बच्चे हैं हम, एक हमारी माता ।
दाना-पानी देनेवाला, एक हमारा दाता ।
फिर ना जाने किस मूरख ने, लड़ना हमें सिखाया ॥
सबसे करलो प्यार..॥२॥
उँच-नीच और भेद-भाव की, दीवारों को तोड़ा।
बदला जमाना तुम भी बदलो, बुरी आदतें छोंड़ों ॥
जागो और जगाओ सबको, समय भी ऐसा आया।
सबसे करलो प्यार॥३॥
भजन नं - ५
तू है सच्चा पिता, सारे संसार का, ओम् प्यारा।
तू ही तू है रक्षक हमारा।
चाँद- सुरज सितारे बनाये, पृथिवी, आकाश, पर्वत सजाये।
अन्त पाया नहीं, तेरा पाया नहीं पार वारा। तू ही तू है....
पक्षीगण राग सुंन्दर हैं गाते, जीव-जंन्तु भी सर है झुकाते।
उनको ही सुख मिला, तेरी राह पर चला, जो प्यारा। तू ही तू है......
पाप-पाखण्ड हमसे छुड़ाओ, वेद मार्ग पै हमको चलाओ।
लगे भक्ति में मन, करे सन्ध्या हवन, जगत सारा। तू ही तू है..
अपनी भक्ति में मेरे मन को लगाना, कष्ट नन्दलाल के सब मिटाना।
दुनिया धन वालों का और कंगालों का, और धन वालों का। तू सहारा तू ही...
भजन नं ६
ओम् की छाया तले, जीवन की सांस चले।
ओम् का नाम लेके, प्रभु का ध्यान धरके।
जीवन की शाम ढले । ओम् की छाया तले.....
आँखो में प्रेम डोले, मुख मधुर सत्य वचन निकले ॥ बोले। ओम् की छाया तले.....
दया धर्म से, शुभ कर्म से ज्ञान की ज्योति जले ॥ ओम् की छाया तले.....
न कोई ऊचाँ, न कोई नीचा सबमें प्रभु हैं रमे ॥ ओम् की छाया तले.....
सभी हैं अपने, कोई न पराया। सबसे मिलके चलें ॥ ओम् की छाया तले.
भजन नं - ७
हृदय से मेरे भगवन् ! इक ओम् नाम निकले। चलते व फिरते सोते, इक ओम् नाम निकले।
गारों व पर्वतों से और उनकी चोटियों से। हर ज़र्रे-ज़र्रे में से, इक ओम् नाम निकले ॥
नाड़ी से और नसों से, आँखो की पुतलियों से। हर अंग-अंग में से, एक ओम् नाम निकले।
मरते समय भी भगवान! जब प्राण हो लबों पर।
आखिर समय भी मुख से, यह ओम् नाम निकले ॥
भजन नं - ८
ओम् है जीवन हमारा, ओम् प्राणाधार है।
ओम् है कर्त्ता विधाता, ओम् पालनहार है।।
ओम् है दु:ख का विनाशक, ओम् सर्वानन्द है। ओम् है बल तेजधारी, ओम्
करुणाकन्द है। ओम् सबका पूज्य है, हम ओम् का पूजन करें। ओम् ही के जाप से, हम शुध्द अपना मन करें । ओम् का गुरुमंन्त्र जपने से रहेगा शुध्द मन ।
बुध्दि दिन का प्रतिदिन बढ़ेगी, धर्म में होगी लगन ॥ ओम् के जप से हमारा, ज्ञान बढ़ता जाएगा।
अन्त में यह ज्ञान हमको, मुक्ति तक पहुँचाएगा ॥
भजन नं ९ (तर्ज गजरा मोहब्बत वाला...)
दुनियाँ बनाने वाला, बिगड़ी बनाने वाला । सबका है दाता भगवान्, माने ना माने इंसान ॥ १. आंखें ना हाथ जिसका ना कोई आकार देखो । ना ही हथियार कोई ना ही औजार देखो। रचना है फिर भी कैसी अद्भुत संसार देखो। बादल गरजाने वाला बिजली चमकाने वाला ।
कैसा है निराला प्रोग्राम, माने ना माने इंसान...॥ २. संगी ना उसका ना रिश्तेदार कोई । ना ही तस्वीर कोई ना ही आकार कोई । सुनता है सबकी वो ही करले पुकार जो भी । सज्जन हंसाने वाला दुर्जन रूलाने वाला । यथायोग्या देता अंजाम, माने ना माने इंसान....॥ ३. निर्जन भयानक वन से चाहे जो पार जाना ।
भक्ति और तप के द्वारा भवसागर पार जाना ।
'पथिक' मंजिल से पहले हिम्मत ना हार जाना।
उलझन सुलझाने वाला, मार्ग दिखलाने वाला।
रखता सभी का वही ध्यान, माने ना माने इंसान ॥
भजन नं १०
(तर्ज-अच्छा शिला दिया...) कुछ नहीं करुणानिधान चाहिए। एक तेरी दया दयावान चाहिए ।
१. धन की लगन नहीं मन में समाये जिसके नशे में तेरा नाम भूल जाए।
ऐसा ना कोई सामान चाहिए एक तेरी दया दयावान चाहिए |
२. आदमी ना माने पर मानना पड़े। झोंपड़ी में जिन्दगी बिताना जो पड़े।
कोठी ना बंगला मकान चाहिए एक तेरी दया दयावान चाहिए ॥
३. दुनिया सताए तो सताने दीजिए। दिल भी दुखाए तो दुखाने दीजिए। मेहरबान तू ही मेहरबान चाहिए एक तेरी दया दयावान चाहिए । ४. क्या कहें उसे जो तेरा नाम ना जपे। होकर के मग्न सुबह शाम ना जपे। ऐसी ना 'बेमोल' जुबान चाहिए एक तेरी दया दयावान चाहिए ॥
भजन नं ११ (तर्ज-जीया बेकरार...)
ओ३म् का सुमिरन किया करो-प्रभु के सहारे जिया करो। जो दुनिया को मालिक है, नाम उसी का लिया करो। १. यह दुर्लभ मानव तन तूने बड़े भाग्य से पाया । विषयों में फंसकर क्यूं मूर्ख हीरा जन्म गंवाया ।
दुष्ट संग ना किया करो सज्जनों से गुण लिया करो..... २. पता नहीं कब रूक जाए ये चलते-चलते श्वासा । इक क्षण भर में खत्म होय ये जग का सभी तमाशा । सुबह-शाम रट लिया करो याद प्रभु को किया करो.....
३. मनुष्य मात्र से प्रेम बढ़ाना सब में प्रभु समाया । मिलकर रहना सब हैं अपने कोई नहीं पराया । दु:ख ना किसी को दिया करो द्वेषभाव ना किया करो.... जो ४. सच्चा सुख है प्रभुभक्ति में बात न समझो झूठी ।
वही मोक्ष पद पाते जो पीते ओ३म् नाम की बूटी।
जो दुनिया
जो दुनियां ।
दुनियां |
ओ३म् नाम रस पिया करो ‘राघव भूल ना किया करो..... जो दुनियां ।
भजन नं १२
(तर्ज-ओ दूर के मुसाफिर चन्दा मुझे बता दे...) दुनिया में रहने वाले, क्या तुझको ये खबर है। दो दिन की जिन्दगी है, पल भर का ये सफर है ॥
१. जीना जो चाहते थे, वो भी तो जी ना पाए । घर बार छोड़के सब मिट्टी में जा समाए ॥ कल तेरा मेरा सबका अंजाम ये हसर है - दो दिन की... ॥
२. आँखों ने तेरी तुझको, कितने दिखाये मुर्दे । कन्धों पे तूने अपने, कितने उठाये मुर्दे । फिर भी बना है अन्धा, जब की तेरी नजर है- दो दिन की...॥
३. जब मौत ने पुकारा, कुछ भी ना काम आया। जाते हुओं को देखो, कोई ना रोक पाया ॥ सच्चाई से तूं इसकी क्यूं आज बेखबर है - दो दिन की...॥
४. मत नाज कर तू अपने, एहबाब दोस्तों पे लोट आएंगे ये तुझको बस खाक में मिलाके । तेरा वहाँ ना कोई, हम दम ना हम सफर है दो दिन की...॥ ५. मरने से पहले तोबा, अपने गुनाह से करले । अनजान मान जा तूं राहे खुदा पे चल दे । मरने के बाद तेरा मुश्किल बहुत सफर है दो दिन की...॥
भजन नं १३
(तर्ज-मुझे तेरी मोहब्बत का सहारा...) बसर संसार में आकार प्रभु को भूल जाता है।
माया ममता में मन लाकर प्रभु को भूल जाता है । १. रहा ना याद वो दिन जब अन्धेरा ही अन्धेरा था। तू जब उल्टा लटकता था नरक के बीच डेरा था । जरा-सी रोशनी पाकर प्रभु को भूल जाता है.... ॥
२. भला क्या है बुरा क्या है तनिक भी जान पाया ना ।
दिया सब कुछ तुम्हें जिसने उसे पहचान पाया ना ।
मगर क्यों तू कुछ पाकर प्रभु को भूल जाता है.... ॥ ३. धरा पर हर तरफ अमृत भरी रसधार बहती है। ये गंगा ज्ञान की लेकर निराला प्यार बहती है। अमर यह आप विष खाकर प्रभु को भूल जाता है.... ॥
४. ये चादर ओढ़कर जब तू पिता के पास जाएगा। हजारों दाग हैं इस पर शर्म से सिर झुकाएगा । क्यों तू 'बेमोल' गा-गाकर प्रभु को भूल जाता है....!!
भजन नं १४ (तर्ज-मुझे इश्क है तुम्हीं से....)
सृष्टि रचाने वाले, कितना महान् है तू । दाता दया के सागर, प्राणों का प्राण है तू । १. सूरज बनाया तूने, चन्दा रचाया तूने । तारों को रोशनी दी, नभ में सजाया तूने । सब कुछ बनाया तूने, पर लामकां है तू....॥
२. सारे जहाँ के वाली, ए गुलशनों के माली ।
हर चीज से है जाहिर, हिकमत तेरी निराली ।
फुलों में तेरी लाली, पर बेनिशान है तू....।।
३. पापी जो पाप करते, नहीं तेरा जाप करते ।
अपने किये कर्म पर ना पश्चात्ताप करते । उन पर भी मेहर तेरी, कैसा मेहरबान है तू....!! ४. 'बेमोल' बैठे पंछी तुझको ही भज रहे हैं। ऊंचे पहाड़ टीले दुल्हन से सज रहे हैं । नगमे से बज रहे हैं मीठी-सी तान है तू....!!
भजन नं - १५ (तर्ज-रोते हुए आते हैं सब....)
भक्ति में मन परहित में तन जब तेरा हो जाएगा।
तब तुझे खुद के ही भीतर परमात्मा मिल जाएगा ॥
१. जिन्दगी का क्या भरोसा, आज है कल को नहीं।
मौत सिर पर आ विराजे, हो सके तब कुछ भी नहीं।
वक्त रहते चेत पगले, वरना फिर पछताएगा....॥
२. साथ देने जो चले हैं, भूल ही सब जायेंगे ।
डालकर तुझको चिता में, लौटकर घर आयेंगे।
पाला था जो तन यत्न से, खाक में मिल जाएगा...॥
३. छल-कपट और पाप से ही, बस तेरा नाता रहा।
दीन-दुखियों-निर्बलों को, दु:ख ही दुःख देता रहा।
सोच ले तू जैसा बोता, वैसा ही फल पाएगा...॥ ४.
मोक्ष साधन श्रेष्ठ जीवन, तुझको वेदों से मिले।
'गोविन्द' इस पथ पर चलें तो फूल जीवन में खिलें।
वेदवाणी को न तजना, वरना फिर पछताएगा....॥
भजन नं १६
~ (तर्ज-दिल के अरमां....)
जिन्दगी में भूलकर ना पाप कर। दो घड़ी परमात्मा का जाप कर ॥
१. भक्ति-शक्ति-मुक्ति मिलती मोल ना। भक्ति करनी है तो अपने आप कर.... ॥ २. मन के मन्दिर में वो आएगा नजर पहले मन के आइने को साफ कर....॥
३. भूल से कोई भी पाप हो जाये तो। बैठकर एकान्त पश्चात्ताप कर....!! ४. राह में कांटे बड़े बेमोल हैं। हर कदम रखना संभलकर नापकर....॥
भजन नं १७
(तर्ज-तू प्यार का सागर है.... ) दाता तेरे सुमिरन का वरदान जो मिल जाये । मुरझाई कली दिल की एक आन में खिल जाये । १. सुनते हैं तेरी रहमत दिन रात बरसती है । एक बूंद जो मिल जाये, तकदीर बदल जाये ॥ २. यह मन बड़ा चंचल है, चिन्तन में नहीं लगता। जितना इसे समझाऊँ, उतना ही मचल जाए ॥ ३. हे नाथ मेरे दिल की बस इतनी तमन्ना है। पापों से बचा लेना, पाँव न फिसल जाए ॥ ४. देवत्व के फूलों से, दामन को मेरे भर दो जीवन ये सुगन्धित हो, दुर्गन्ध निकल जाए ॥ ५. ऐ मानव तू दिल से प्रभु नाम का सिमरन कर दोषों भरे जीवन का काँटा ही बदल जाए ॥
भजन नं १८ (तर्ज-तुम्हीं मेरे मन्दिर....)
तुम्हीं मेरे बन्धु सखा तुम्हीं मेरे, तुम्हीं मेरी माता, तुम्हीं पिता हो । तुम्हीं मेरे रक्षक, तुम्हीं मेरे पालक, तुम्हीं इष्ट मेरे तुम्हीं देवता हो ॥ १. तुम्हें छोड़ किसकी शरण में मैं जाऊँ, है सब कुछ तेरा क्या तुझ पर चढ़ाऊँ । • तुम्हीं मेरी विद्या तुम्हीं मेरी दौलत, मैं क्या क्या बताऊँ कि तुम मेरे क्या हो ।
२. तुम्हीं ने बनाए शशि भानु तारे, अमन और गगन जल हवा भूमि स तुम्हीं ने रचा यह संसार सारा, अजब कारीगर हो अजब स्वयता हो । ३. जमाना तुझे ढूंढ़ता फिर रहा है, न पाया किसी को छुपा तू कहाँ है। पता मिल रहा है पते पत्ते से तेरा, गलत है जो कहते हैं तुम लापता हो || अजब तेरी लीला अजब तेरी माया, सभी से अलग है सभी में समाया। सत्ता से तेरी मुकर जाए कैसे? की हर सूं 'वीरेन्द्र' रहे जगमगा हो । ४.
भजन नं १९
एक झोली में फूल भरे हैं एक झोली में कांटे रे कोई कारण होगा। तेरे बस में कुछ भी नहीं ये तो बांटने वाला जाने रे कोई कारण होगा। १. पहले बनती है तकदीरें फिर बनते हैं शरीर । ये प्रभु की कारीगरी है तूं क्यों है गम्भीर २. नाग भी इस तो मिल जाए किसी को जीवनदान । चींटी से भी मिट सकता है किसी का नामोनिशान....॥ ३. धन का बिस्तर मिल जाए पर नींद को तरमें नैन । कांटों पर सोकर भी आए किसी के मन को चैन ॥
४. सागर से भी बुझ सकती नहीं कभी किसी की प्यास कभी एक ही बूंद से मिट सकती है मन की आस....!
भजन नं २०
(तर्ज-दिल ही दिल में दे दिया....)
होश आता है बसर को उम्र ढल जाने के बाद । वक्त की कीमत समझता वक्त ढल जाने के बाद || १. आने से पहले मुसाफिर, राहों में उलझा रहा । लौटता मायूस होकर गाड़ी निकल जाने के बाद....॥ २. जब बदलने का समय था, तब तो तूं बदला नहीं । अब जो बदला क्या हुआ, सब कुछ बदल जाने के बाद....॥ ३. क्यों खड़ा अफसोस करता कल की बातों पर जनाब | लौटकर आता नहीं है तीर चल जाने के बाद....!!
४. आज तो 'बेमाल' तुझको, दे रहे है दात सब ।
लोग जाने क्या कहेंगे तेरे कल जाने के बाद....॥
भजन नं - २१
(तर्ज-तेरे प्यार की निशानी...)
कुछ काम करके जाना दुनिया से जाने वाले।
जाते हैं रोज लाखों बेकार खाने वाले | १. चौरासी लाख खोए हर जन्म मरन रोए । अब व्यर्थ मत गंवाना दिन चार जीने वाले.....॥ १२. हिंसा असत्य चोरी कर करके माया जोड़ी | क्या साथ ले चलेगा सब छोड़ जाने वाले.....!!
३. जोरू जमीन जर से, करता है क्या मुहब्बत। सब छोड़ने पड़ेंगे, नहीं साथ जाने वाले....॥ ४. जन्मा है जो भी मित्रो, मरना जरूर होगा। अब बेखबर न रहना, दुनियाँ से जाने वाले.... ॥
भजन नं २२
(तर्ज-बहुत प्यार करते हैं.... )
नहीं चाहिए दिल दुखाना किसी का सदा ना रहेगा जमाना किसी का ॥
१. जो मालिक बुलाए तो जाना पड़ेगा, सभी को वहाँ सिर झुकाना पड़ेगा।
वहाँ ना चलेगा बहाना किसी का नहीं चाहिए दिल दुखाना किसी का ॥ २. सुख और दुख में सब्र करना सीखें, अपनी कमाई से गुजर करना सीखें।
नहीं चाहिए हक दबाना किसी का नहीं चाहिए दिल दुखाना किसी का ॥
३. कभी दूसरों की ना पगड़ी उछालें, अपनी कमी को दिल से निकालें। कभी ना सुनाएं फंसाना किसी का नहीं चाहिए दिल दुखाना किसी का ॥ ४. 'पथिक दूसरों की बिगड़ी बना दो, रोते हुओं को जरा तुम हंसा दो।
५.
सुना दो उन्हें भी तराना किसी का नहीं चाहिए दिल दुखाना किसी का ॥ सोहरत तुम्हारी यूँ ही वह जाएगी, दौलत ये सारी धरी रह जाएगी।
जाएगा न संग में खजाना किसी का नहीं चाहिए दिल दुखाना किसी का ॥
६. पहले तुम अपने आप को संभालों, दूसरों की गलतियाँ बाद में निकालो। बुरा है बुरा है ये बताना किसी का नहीं चाहिए दिल दुखाना किसी का ॥
भजन नं २३
(तर्ज-मिलती है जिंदगी में....)
आदत बुरी सुधार लो, बस हो गया भजन ।
मन की तरंगें मार लो-बस हो गया भजन....॥
१. दृष्टि में तेरी खोट है दुनिया निहार में ।
समता का अज्जन डाल ले. बस होगया भजन ॥२॥
२. दुनियाँ तुम्हें बुरा कहे पर तुम करो क्षमा ।
वाणी को भी संवार लो-बस हो गया भजन....॥
३. विषयों की तीव्र आग में जलता ही जा रहा ।
इतना ही तू विचार ले. बस होगया भजन ॥३॥
४. रिश्तों से मोह त्याग
प्रभु से प्रेम कर
इतना ही मन विचार लो-बस हो गया भजन....॥
५. जाना है सबको एक दिन दुनियाँ को त्याग कर
जीवन को तुम संवार लो-बस हो गया भजन ॥ ६. आया कहाँ से कौन तू जाएगा तू कहाँ । इतना ही विचार लो-बस हो गया भजन....॥
भजन नं २४
(तर्ज जब हम जवां...)
मानव तू मानव बन, ये छोड़ दे पागलपन।
अनमोल है जीवन, प्रभु का नाम लिए जा- शुभ काम किए जा ॥
१. मानव हो कुछ मनन करो क्या करना है, काँटों की राहों में संभल पग धरना है। दुनियां दुरंगी है सही पहचान किए जा- शुभ काम किए जा ॥ २. गोरी गजनी शाह सिकन्दर आए थे, लूट मारकर बड़े जुल्म यहाँ ढहाये थे। दुश्मन की सेना से सदा संग्राम किए जा-शुभ काम किए जा ॥ ३. बड़े-बड़े योद्धा आए और चले गए, कालचक्र की चक्की में सब दले गए।
खाली गये सारे यही पैगाम दिए जा-शुभ काम किए जा ॥ ४. सत्यवीर जो तप कुर्बानी करते हैं, देश धर्म जाति के लिए जो मरते हैं। उन देशभक्तों में तू अपना नाम किए जा शुभ काम किए जा ॥
भजन नं २५
आज क्यों आंखें अश्कों में डबडबाई हैं। तेरी करनी ही आज आगे तेरे आई है। १. भली बातों में दिल लगाना तुमने छोड़ दिया। विषयों में फंसकर भोगों से नाता जोड़ लिया। ऐसा नादान बना, खुद हैवान बना, हर तरीके से कमाया कि जरीमान बना।
बोतल चढ़ा के मस्ती में आके सारी उम्र गंवाई है....!! २. याद कर अपने लिए कितने घर उजाड़े हैं।
जीभ के स्वाद में निर्दोष पशु मारे हैं। सोचता कुछ तो भला काटता जिनका गला, ममता की बाहों में वो भी तो होगा पला । अपने पिसर की लखते जिगर की ममता समाई है.... ॥
३. अपने शुभ कर्म से इंसान संभल सकता है। अपनी तदबीर से तकदीर बदल सकता है। तमसो मा ज्योतिर्गमय वेद के पथ गहे, तभी पा सकता है 'राकेश' तू मृत्यू से अभय कविता तुम्हारी सरिता से प्यारी सबको पसन्द आई है....॥
भजन नं २६
(तर्ज-जिंदगी प्यार का....)
जिन्दगी कितनी अनमोल है, वृथा यूं ही चली जा रही है।
तूने अनजान जाना नहीं, आखिरी जो घड़ी आ रही है।
१. तूने बच्चों से लग मेल में, खोया बचपन यूं ही खेल में । अपना सब कुछ लुटाता रहा, तुझको कुछ भी खबर न रही है.....!!
२. मदभरी इस जवानी में भी अपने मन को न मारा कभी ।
रस विषयों का पीता रहा, प्यारा जीवन संवारा नहीं है....!!
३. बीता बचपन जवानी गई, बेटे पोते भी अब हो गए।
रात-दिन नींद आती नहीं, माया ठगनी ही नींद खा रही है....।। ४. अपनी कीमत न जानी कभी, रहा 'बेमोल' बेमोल तू । गीत ऐसे ही गाता रहा, सारी दुनिया जिन्हें गा रही है....।।
भजन नं - २७
(तर्ज-छुप गया कोई रे दूर से पुकार के.....)
पीपल के पत्ते ऊपर तेरा ठोड़ ठिकाना है । क्या जाने किसी वक्त टूटकर मिट्टी में मिल जाना है। १. पका हुआ खरबूजा जैसे स्वयं छोड़ दे डाली को । ऐसे ही तुम छोड़ के जाना इस दुनियां मतवाली को । मृत्यु का बन्धन कट जावे अमृत पद को पाना है....॥ २. उत्तम-मध्यम-अधम पाश को परमेश्वर ढीला कर दे । यम-नियम के परिपालन से दामन में खुशियाँ भर दे।
हो जावे अपराध रहित नर जीवन शुद्ध बनाना है....।।
१३. हंसना-गाना-मौज मनाना खाना-पीना सोना है ।
नियत समय तक इन सब से सम्बन्ध सभी का होना है अन्तकाल में महाकाल में ही हर हाल समाना है....!! ४. ये काया तो भष्म बनेगी आखिर इसका अन्त यही है। अग्नि वायु जल सभी छोड़ दे वेद में सच्ची बात कही है।
'पथिक' सिमरले ओ३म् नाम को गर मीठा फल खाना है.... ॥
भजन नं २८
(तर्ज- ए मेरे दिले नादां तू गम से ना....) सोचा ना कभी तूने संसार से जाना है ।
संसार से जाना है कब लौट के आना है ॥ १. जाएगा यहाँ से जब संगी न सखा होगा । दौलत न साथ जाए पैसा न टका होगा । दो गज कफन का टुकड़ा जिसमें मुंह छिपाना है....॥
२. दो दिन की जिन्दगी है दो दिन के खेल तेरे ।
दो दिन के रिश्ते नाते दो दिन के मेल तेरे ।
कारवां ये जिन्दगी का इतना सा फंसाना है.... ॥ ३. अम्बर को छू रहे हैं ऊंचे मकान तेरे । माना कि उड़ रहे हैं नभ में विमान तेरे । ये चन्द दिनों का तेरा सब ठाठ सुहाना है....!!
भजन नं २९
(तर्ज- उड़ी-उड़ी रे पतंग....)
चली चली रे उम्र तेरी चली रे।
चली छोड़ संसार बड़ी तेज रफ्तार दिन रात पे सवार होके चली रे ।। १. ये ना सोचा दिन चार जवानी, चार दिन में है खत्म कहानी ।
जाए छोड़ घर बार, बेटा-बेटी और नार-जब मौत सिरहाने तेरी खड़ी रे.... ॥
२. ये जगत् मुसाफिरखाना, हुआ क्यूं तूं इसमें दिवाना। होके ठगीया कमाए, सब यहीं रह जाए फिर आना न होगा इस गली रे....!
३. अपने मन को तू समझाले, कुछ अपना आप बना ले। कर प्रभु से प्यार, तेरा होगा बेड़ा पार क्यूं फिरता आवारा गली-गली रे....।
४. बिन ओम् नाम कोई ना सहारा, ऋषि-मुनियों ने यही है पुकारा।
ना तूं जंगलों में जा, नहीं तुझसे जुदा, आज बात मैं सुनाऊँ भली-भली रे....॥
भजन नं ३०
(तर्ज-धीरे-धीरे-बोल....)
मन मोड़ा फिर डर नहीं, कोई दूर प्रभु का घर नहीं । धीरे-धीरे मोड़ तूं इस मन को इस मन को तूं इस मन को २ ॥ १. मन लोभी मन कपटी मन है चोर, कहते आए ये पल-पल में ओर। बेईमान क्यूं नादान क्यूं, गफलत ऐसे कर नहीं कोई दूर प्रभु.....!!
२. जप-तप-तीर्थ सब होते बेकार, जब तक मन में रहते भरे विकार ।
कुछ जानले पहचान ले, होना है विचलित नहीं कोई दूर प्रभु..... ॥ ३. जीत लिया मन फिर ईश्वर नहीं दूर जान बूझकर इनसां क्यूं मजबूर। अभ्यास से, वैराग्य से, कुछ भी है दुष्कर नहीं कोई दूर प्रभु.....॥ भजन नं ३१ - (तर्ज-जिस दिल में बसा था प्यार तेरा....)
जब दिल में बसा दिलदार मेरा तो दिलदार को ढूंढ़न जाऊँ कहाँ । कण-कण में रमा करतार मेरा करतार को ढूंढन जाऊँ कहाँ ॥ १. गुरु माता-पिता-बन्धु व सखा सारे जग का आधार वही । मेरा तो है परिवार वही परिवार को ढूंढन जाऊँ कहाँ ॥
२. दुनिया दो दिन का मेला है इसमें सब कुछ बेगाना है । जब सबका एक ठिकाना है तो घरवार को ढूंढन जाऊँ कहाँ ॥ ३. है निराकार वो परमेश्वर जिसका कोई आकार नहीं । मानव की तरह वो साकार नहीं निराकार को ढूंढन जाऊँ कहाँ । ४. जिस तार में वो करतार छिपा 'बेमोल' वो तार छिपा दिल में। मेरा तो है भरतार वही भरतार को ढूंढन जाऊँ कहाँ ॥
भजन नं ३२
(तर्ज रहा गर्दिशों में हरदम.... )
जिस दिन घमण्ड अपने सर से उतार देगा ।
उस दिन तुझे विधाता अनमोल प्यार देगा |
१. उसके समान जग में दाता ना और कोई ।
देने पे जब वो आए तो बेशुमार देगा......||
२. मन वचन कर्म उसकी आज्ञा अनुसार करले।
वो तो फिदा है तुझपे सर्वस्व वार देगा..... I
३. भगवान् छोड़ साथी इन्सान को बनाया । सुख में जो साथ देता दुःख में भी साथ देगा.....।। ४. अन्तिम समय कहा कि नेकी कमा लूं लेकिन । उस पल 'पथिक ना कोई जीवन उधार देगा.....॥
भजन नं ३३
(तर्ज- ये प्यार का नगमा है....) यह दुनिया अरे पगले, एक ओम् कहानी है। अपना न यहाँ कोई, हर चीज बेगानी है ॥
९. जब फूल सा बचपन भी कायम न रहा तेरा । हर सांस यही कहता है, दो दिन की जवानी है ॥ २. क्यों मोह में आकर तूं, खुद को ही भुला बैठा
जो आया उसे जाना, यह रीत पुरानी है ।
३. श्रीकृष्ण से तेजस्वी, अर्जुन से धनुर्धारी ।
राणा की बता जग में, क्या नामोनिशानी है ॥
४. शुभ कार्य ही साथी हैं, सुख-दुःख में सदा तेरे । दुनयां ने तो दुनियां की दुविधा ही बढ़ानी है ॥ ५. प्रभु नाम की शरण तूं ले, वेदों की सच्चाई से । जीवन की अगर नौका उस पार लगानी है ॥
भजन नं ३४
(तर्ज छुप गया कोई रे दूर से पुकार के....)
सोचा नहीं तूने कभी बैठकर अकेले में । कौन तेरा तूं है किसका दुनियां के मेले में ॥ १. कौन साथ आया तेरे कौन साथ जाएगा । लाया था क्या ले जाएगा डालकर के थैले में.... ॥ २. क्या किसी से लिया तूने क्या किसी को दे दिया ।
जीवन ही बर्बाद किया इसी देने लेने में....II
३. जीवन का उद्देश्य यदि "प्रेमी नहीं जाना तूं ।
हीरा जन्म लुटा दिया कूदकर झमेले में....॥
भजन नं ३५
मिट्टी के पुतले चलना पड़ेगा जरूर।
गांव तेरा बड़ा दूर-मिट्टी के पुतले चलना पड़ेगा जरूर ॥
१. तेरा रोब ये रंगीला और बदन गठीला,
तूं जवान भी सजीला चले झूम-झाम के। ये जो फूल सी जवानी चन्द रोज की निशानी, आनी-जानी ये जवानी रख रोकथाम के ।
इस पे ना कर तूं गरूर ॥
२. ये जो राजशाही ठाठ और भूमि के प्लाट, हाट, ठाठ बाट सब यहीं रह जायेंगे। ये जो माया के मकान, ध्यान रहे ये दलान, सब ढह जायेंगे।
होंगे सभी ये चकनाचूर....॥
३. कोई कहे भाई-बाप, सब करेंगे विलाप आप पड़े चुपचाप कोई बोलेगा ना चालेगा।
नाड़िया टटोल कोई मुख तेरा खोल कोई पानी चार तोले तेरे मुख बीच डालेगा।
रोयेंगे खड़े हो मजबूर....॥
४. मिले काठ की सवारी रहे पूछ नर-नारी, आज कहां की तैयारी जरा बोल तो सही। लई तगड़ी भी तोड़ रह गए करोड़, लिए पैर क्यों सिकोड़ जरा बोल तो सही।
'लक्ष्मण' क्यों बिखरा तेरा नूर....॥
भजन नं ३६ -
(तर्ज-अच्छा शिला दिया....)
जाप ना किया तूने ओ३म् नाम का। सर्वशक्तिमान् प्यारे सुखधाम का ॥ १. जिन्दगी में कोई शुभ कर्म ना किया। धर्म ना किया दूर भ्रम ना किया। बोल तेरा तन फिर किस काम का....॥
२. दिन-रात जिसको सजाने में लगा। अपने ही मन को रिझाने में लगा। कुछ ना बनेगा तेरे गोरे चाम का....!!
३. उल्टे ही कर्म कमाए उम्र भर। पेड़ ही बबूल के लगाए जिन्दगी भर । कहां से मिलेगा तुझे फल आम का....॥
४. खुशी का पैगाम तो प्रभात लाई है। और भी 'बेमोल' कुछ साथ लाई है।
जाने क्या सन्देश लाए वक्त शाम का..... जीवन बीत रहा पल-पल में जीवन बीत रहा पल-पल में। किसे पता है कोन जगह ना आने वाली कल में.... ॥
भजन नं ३७
१. महाकाल विकराल खड़ा है, अपना फन्दा डाल खड़ा है। कोई बचा ना कोई बचेगा मृत्यु की हलचल में...॥ २. भरत कहां है राम कहां है, धर्मराज घनश्याम कहां है । है कोई उनका पता बताए सारे भूमण्डल में....॥
३. टिमटिम करते नभ में तारे छुप जायेंगे • एक दिन सारे । नहीं बिजुरिया चमकेगी इस काले से बादल में....॥
४. मोहमाया में भटक रहा है किस उलझन में अटक रहा है।
बिता दिया 'बेमोल' ये जीवन दुनियां की कल-कल में....॥
भजन नं ३८
(तर्ज-बस्ती बस्ती पर्वत पर्वत गाता....)
ओ३म् नाम का सुमिरन करले करदे भव से पार तुझे।
कह दिया कितनी बार तुझे ॥
१. जिस नगरी में वास तेरा ये ठग चोरों की बस्ती है।
लुट जाते हैं बड़े-बड़े फिर तेरी तो क्या हस्ती है ।
जिसको अपना समझ रहा ये धोखा दे संसार तुझे.
२. हाथ जोड़कर गली-गली जो मित्र तुम्हारे डोल रहे।
कोयल जैसी मीठी वाणी कदम-कदम पर बोल रहे।
बनी के साथी बिगड़ी में ना गले लगाएं यार तुझे....॥
३. दौलत का दिवाना बनकर धर्म-कर्म सब भूल रहा ।
पाप-पुण्य का पता नहीं कुछ नींद नशे में टूल रहा ।
ईश्वर को भी नहीं जानता ऐसा चढ़ा खुमार तुझे....॥
४. तुझसे पहले गए बहुत से कितना धन ले साथ गए।
लक्ष्मणसिंह 'बेमोल' कहे वो सारे खाली हाथ गए ।
तू भी खाली हाथ चलेगा देखेंगे नर-नार तुझे....॥
भजन नं ३९
(तर्ज-जिस दिल में बसा था प्यार तेरा....) संसार में आकर देख लिया संसार हमारा हो न सका । घरबार बसाकर देख लिया घरबार हमारा हो सका । १. यारों की रसीली बातों पर मुझको तो रहा एतबार नहीं । कितनों को बनाकर देख लिया कोई यार हमारा हो न सका.... ॥ २. हर दिलदारों की बस्ती में दिलवर को ढूंढ़ने जा पहुंचे ।
दिलदार ने बस दिल छीन लिया दिलदार हमारा हो न सका....॥
१३. शर्ते सब निभाई हैं हमने कसमें भी खाई
हमने ।
फिर भी इस दुनिया वालों को एतबार हमारा हो न सका....॥
४. ये तेरा है ये मेरा है 'बेमोल' ये कैसी उलझन है।
हम तो परिवार के हो भी गए परिवार हमारा हो न सका....॥
भजन नं ४०
(तर्ज करो प्रभु से प्यार अमृत....) देखी बहुत निराली महिमा सत्संग की ।
१. सत्संग अन्दर मोती हीरे, मिलते लेकिन धीरे-धीरे ।
जिसने खोज निकाली, महिमा सत्संग की...... ॥
२. सत्संग सच्चा तीर्थ भाई, करते जिनकी नेक कमाई ।
कर्महीन रहे खाली, महिमा सत्संग की..…....॥
३. सत्संग ही सब संकट टारे, डूबे हुए को सत्संग तारे ।
दिन-दिन हो खुशहाली महिमा सत्संग की...॥
४. सत्संग से सब प्रेम बढ़ाओ, समय न अपना व्यर्थ गंवाओ।
'देश' पिटै ना ताली महिमा सत्संग की......!!
भजन नं ४१
(तर्ज-तुम्हीं मेरे मन्दिर....)
प्रभु मेरे जीवन का उद्धार कर दो, भंवर में है नैया इसे पार कर दो ॥ १. मेरी इन्द्रियाँ हों सदा मेरे वश में, मेरे मन पे मेरा ही अधिकार दो ॥
२. न शुभकर्म करने में पीछे रहूं मैं, कुकर्मों से मुझको खबरदार कर दो ॥ से ३. मैं गाऊँ सदा ही वेद की ऋचायें, मेरे मन में वेदों का संचार कर दो।
४. मेरा सिर झुके तो झुके तेरे दर पर, मुझे ऐसा दुनिया में सरदार कर दो ॥
५. मैं समझूगा ना जग में किसी को बेगाना, मेरा विश्व भर के लिए प्यार कर दो।
६. 'पथिक' राह में हो कोई दीन-दुखिया, मदद के लिए मुझको तैयार कर दो।
भजन नं ४२
मेरे देवता मुझको देना सहारा कहीं छूट जाये ना दामन तुम्हारा || १. चमकते हैं दुनियाँ में चाँद तारे, तेरी ज्योति से ज्योति लेते हैं सारे। घुमाता है इनको एक तेरा सहारा कहीं छूट जाये ना दामन तुम्हारा ॥ २. तेरे रास्ते से मुझको हटाती है दुनिया, मनोहर बहुत रूप दिखाती है दुनिया।
न देखूं में जग का ये झूठा इशार-कहीं छूट जाये ना दामन तुम्हारा ||
३. सिवा तेरे मुझमें समाये न कोई, लगन का ये दीपक बुझाये न कोई । तू ही मेरी नदियाँ तू ही है किनारा-कहीं छूट जाये ना दामन तुम्हारा ॥ ४. तेरे गीत हरदम गाता रहूँ मैं, सुबह-शाम तुझको ही ध्याता रहूँ मैं। तेरा नाम मुझको है प्राणों से प्यारा-कहीं छूट जाये ना दामन तुम्हारा ॥
भजन नं ४३
तुम्हारे दिव्य दर्शन की में इच्छा ले के आया हूँ । पिला दो प्रेम का अमृत पिपासा लेके आया हूँ । ९. रत्न अनमोल लाने वाले लाते भेंट को तेरी । मैं केवल आंसुओं की मंजु माला लेके आया हूँ। तुम्हारे.... ॥ २. जगत् के रंग सब फीके, तू अपने रंग में दें। मैं अपना यह महाबदरंग बाना लेके आया हूँ। तुम्हारे....॥ 'प्रकाशानन्द हो जाये मेरी अन्धेरी कुटिया में । तुम्हारा आसरा विश्वास आशा लेके आया हूँ। तुम्हारे....॥ ३.
भजन नं ४४
मेरा बिछौना ओढ़ना हो पवित्र परमेश्वर
मेरा बैठना दौड़ना हो पवित्र परमेश्वर ॥ १. मेरे विचारों में भी ईश्वर दोष कभी न आए। मेरे घर में अनुचित धन का कोष कभी न आए।
मेरा कमाना जोड़ना हो पवित्र परमेश्वर...... ॥
२. मेरी वाणी में क्रोध की तड़क-भड़क कभी न आए।
मेरी कथनी और करणी में फर्क कभी न आए ।
मेरा तोलना बोलना हो पवित्र परमेश्वर ॥
३. बुरे भाव पैदा करने वाला, हर साधन छुड़ा रहे ।
सत्संग से तो जुड़े हमेशा, कुसंग से मन मुड़ा रहे ।
मेरा यज्ञ, उपासना हो पवित्र परमेश्वर ॥
भजन नं - ४५
(तर्ज - रेशमी....)
करो प्रभु से प्यार अमृत बरसेगा करो प्रभु से प्यार अमृत बरसेगा । १. दया धर्म से प्रीति करलो, भवसागर से पार उतरलो, हो जाएगा बेड़ा पार ॥ २. सत्यज्ञान का गहना पहनो, कड़वे बोल कभी ना बोलो, करो आत्म-उद्धार ॥
३. नहीं किसी के चाचा ताऊ, नहीं किसी के मित्र और साहू, मतलब का संसार । ४. प्रेम प्रभु से जो नहीं करते, पड़े नरक में हैं वो सड़ते, लानत दे संसार ॥
५. प्रेम प्रभु का अमृत प्याला, पीले बनकर किस्मत वाला, हो जाए बेड़ा पार
भजन नं ४६
मेरे दाता के दरबार में है सब लोगों का खाता ।
जो कोई जैसी करनी करता वैसा ही फल पाता ॥ १. क्या साधु क्या संत गृहस्थी, क्या राजा क्या रानी । प्रभु की पुस्तक में लिखी है, सब की कर्म कहानी । अन्तर्यामी अन्दर बैठा, सबका हिसाब लगाता- मेरे दाता....!!
२. बड़े-बड़े कानून प्रभु के बड़ी कड़ी मर्यादा । किसी को कौड़ी कम नहीं मिलती, नहीं किसी को ज्यादा। इसीलिए तो दुनियां का वह, जगत्पति कहलाता- मेरे दाता....॥ ३. चले न उसके आगे रिश्वत, चले नहीं चालाकी । उसके लेने देने की बन्दे, रीत बड़ी है बांकी । पुण्य का बेड़ा पार करे वो, पाप की नाव डुबाता- मेरे दाता....॥
४. करता वही हिसाब सभी का, एक आसन पै डट के । उनका फैसला कभी न पलटे, लाख कोई सर पटके । समझदार तो चुप । है रहता, मूरख शोर मचाता - मेरे दाता....!!
५. उजली करनी करियो लाला, करम न करियो काला । लाख आंख से देख रहा है। तुझे देखने वाला । उसकी तेज नजर से बन्दे, कोई नहीं बच पाता मेरे दाता....॥
भजन नं ४७
(तर्ज-दिल के अरमां....)
मांग बन्दे मांग उस भगवान् से, क्या मिलेगा मांग कर इन्सान से ॥ टेक ॥
१. मिल गया जो जिन्दगी की राह में, सबको दाता न समझ अज्ञान से । २. है वही सारे जमाने का पिता, उसका ही दामन पकड़ जी जान से ॥
३. ले बना साथी सखाओं का सखा, फिर तुझे डर खोफ क्या तूफान से ॥
४. देख ले घर में ही बैठा है कोई, मिल जरा एक बार उस मेहमान से ॥
५. तब कहो श्रीमान् बैठोगे कहाँ, भर लिया किश्ती को जब सामान से ॥
६. तज सुपथ को क्यों कुपथ पर चल पड़ा, हो गई गलती 'पथिक' नादान से ॥
भजन नं ४८ -
(तर्ज-अब सौंप दिया....)
बिन आत्मज्ञान के दुनिया में, इंसान भटकते देखे हैं ।
आम बशर की तो बात ही क्या, सुलतान भटकते देखे हैं ।।
१. जो सबरों सकूं की दौलत है, मिलती है आत्मज्ञानी को ।
तसकीन को तो देखा है, धनवान् भटकते देखे हैं ।
२. सब ज्ञान तो उसने सीख लिया, पर आत्मज्ञान ही सीखा ना।
यही कारण है कि पण्डित भी, अनजान भटकते देखे हैं।
३. जो भटकाते हैं दुनियाँ को, वे आप भटकते देखे हैं ।
गुणवान् भटकते देखे हैं, साइंसदान भटकते देखे हैं ।
४. जिस महफिल में देखा है, हर एक को भटकता पाया है।
हर मेम्बर की तो बात ही क्या प्रधान भटकते देखे हैं ॥
१५. जो आत्मज्ञानी होता है, बलवान् है सारी दुनियाँ में
वैसे तो 'पथिक' इस दुनियाँ में, बलवानू भटकते देखे हैं।
६. अज्ञान के कारण देहधारी, मानव को ही ईश्वर मान लिया।
अब जाने माने लोगों के भगवान् भटकते देखे हैं ॥
भजन नं ४९
(तर्ज तुम मुझे साथ देने का....)
पास रहता हूँ तेरे सदा मैं अरे, तू नहीं देख पाये तो मैं क्या करूँ । मूढ़ मृगतुल्य चारों दिशाओं में तूं, ढूंढ़ने मुझको जाए तो मैं क्या करूँ ॥ १. कोसता दोष देता मुझे है सदा, मुझको ये ना दिया मुझको वो ना दिया। श्रेष्ठ सबसे मनुष्य तन तुझे है सदा, सब्र तुझको न आए तो मैं क्या करूँ ॥ २. तेरे अन्तःकरण में विराजा हुआ, कर ना यह पाप देता हूँ उपदेश में । लिप्त विषयों में हो सीख मेरी भली, ध्यान में तू न लाये तो मैं क्या करूँ ॥
ज्ञान अच्छे बुरे कर्म का हो सके, इसलिए मैंने बुद्धि तुझे दी अरे ।
तू तम्बाकू अम्ल मद्य-मांस आदि खा, रोग तन में बसाए तो मैं क्या करूँ ॥
४. साक फल फूल मेवा व दुग्ध आदि सम, दिव्य आहार मैंने तुझे हैं दिए।
किन्तु तू मन्दभागी अमृत छोड़कर, घोर विष आप खाए तो मैं क्या करूँ ॥
५. अति मनोहर सरस भव्य भाव भरा, विश्व सुन्दर प्रकाश आर्य मैंने रचा।
अपनी करतूत से स्वर्ग वातावरण, नरक तू ही बनाए तो मैं क्या करूँ ॥
भजन नं ५०
(तर्ज तेरी प्यारी प्यारी सूरत को....)
इन्सान नहीं इन्सान रहा, बन गया है पशु समान मेरे भगवान् ।
मानव मानवता खो बैठा, न रही अपनी पहचान मेरे भगवान् ॥ १. नित्यकर्म का ध्यान नहीं, बड़ों का आदर मान नहीं।
राम-भरत और श्रवण जैसी, दीखे अब सन्तान नहीं।
अब मात-पिता और गुरुजनों का, होने लगा अपमान - मेरे
२. वेदों का कुछ ज्ञान नहीं, कहते हैं भगवान् नहीं।
सन्ध्या-हवन से प्रेम नहीं, और शुभ कर्मों में दान नहीं। बस एक ही नारा रह गया है, रोटी कपड़ा व मकान
भगवान्....॥
मेरे भगवान्....!! - मेरे भगवान्....॥ ३. मन्दिर (सत्संग) में नहीं आते हैं, सिनेमा रोज ही जाते हैं। अण्डे-मछली-मांस हैं खाते, हिस्की खूब उड़ाते हैं। युवकों की ऐसी देख दशा, होता है दु:ख महान्
४. द्वार तेरे जो आता है, मुंह-मांगा फल पाता है। मानव-मानव बन जाए, 'नन्दलाल यही अब चाहता है। विनती है आपसे एक यही, इन्सान बने इन्सान
- मेरे भगवान्....!!
भजन नं ५१
आज का इन्सान क्या इन्सान है, चोला मानव का मगर शैतान है ॥
१. बगुले जैसा भेष भक्ति राम की, तन के उजले मन कपट की खान है....!
२. पाप करने से कोई कैसे डरे, मन्दिरों में कैद जब भगवान् है..... ३. अपने से कमजोर का पीता लहू, बेरहम बेप्रीत दिल पाषाण है....
४. कहते हैं परमात्मा कुछ भी नहीं, कैसा सुन्दर आज का विज्ञान है....! ५. लूटकर दौलत जो रखता जोड़कर, वह सभी कुछ मौत का सामान है......
६. ज्ञान की चर्चा न कर इस मंच पर, तू अभी 'बेमोल' खुद नादान है.....
भजन नं - ५२
(तर्ज- तुम मुझे साथे देने का..... )
कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं, बाद अमृत पिलाने से क्या फायदा? कभी गिरते हुए को उठाया नहीं, बाद आँसू बहाने से क्या फायदा? १. मैं तो मंदिर गया पूजा आरती की पूजा करते हुए ये ख्याल आ गया | कभी माँ-बाप की सेवा की ही नहीं, फिर मानव कहलाने से क्या फायदा ?
२. मैं तो सत्संग गया गुरूवाणी सुनी, गुरुवाणी को सुनकर ख्याल आ गया।
जन्म मानव का लेके दया ना करी, फिर मानव कहलाने क्या फायदा ?
३. मैंने दान दिया मैंने जप तप किया, दान करते हुए ये ख्याल आ गया। कभी भूखे को भोजन कराया नहीं, दान लाखों का करने क्या फायदा ? ४. गंगा नहाने हरिद्वार काशी गया, गंगा नहाते हुए ये ख्याल आ गया। तन को धोया मगर मन को धीया नहीं, फिर गंगा नहाने से क्या फायदा ? ५. मैंने वेद पढ़े मैंने शास्त्र पढ़े, शास्त्र पढ़ते हुए ये ख्याल आ गया ।
मैंने ज्ञान किसी को बाँटा नहीं, फिर ज्ञानी कहलाने से क्या फायदा ? ६. माता-पिता के ही चरणों में चारों धाम है, आजा आजा यही मुक्ति का धाम है। सेवा माता-पिता की मन से करो, फिर तीर्थों में जाने से हो फायदा ।
भजन नं ५३
भला किसी का कर ना सको तो बुरा किसी का मत करना । पुष्प नहीं बन सकते तो तुम काँटे बनकर मत रहना ॥ १. बन न सको भगवान् अगर तुम कम से कम इन्सान बनो । नहीं कभी शैतान बनो तुम नहीं कभी हैवान बनो । सदाचार अपना न सको तो पापों में पग मत धरना....! २. सत्य वचन ना बोल सको तो झूठ कभी भी मत बोलो । मौन रहो तो ही अच्छा कम से कम विष तो मत घोलो । बोलो यदि पहले तुम तोलो फिर मुंह को खोला करना....॥ ३. घर ना किसी का बसा सको तो झोंपड़ियाँ ना जला देना । मरहम पट्टी कर ना सको तो घाव नमक ना लगा देना । दीपक बनकर जल न सको तो अंधियारा भी मत करना....॥ ४. अमृत पिला सको न किसी को जहर पिलाते भी डरना । धीरज बन्धा नहीं सकते तो घाव किसी के मत करना । ओ३म् नाम की माला लेकर सुबह शाम भजन करना....॥ सच्चाई की राह में बेशक कष्ट अनेकों मिलते हैं । पर काँटों के बीच में देखो फूल हमेशा खिलते हैं । सूरज की भांति खुद जलकर सब जग को रोशन करना.... ।। ५.
भजन नं ५४ -
(तर्ज आए हो मेरी जिन्दगी में.....)
भगवान् सारे दुर्गुण दुरितों को दूर कर दो।
जो भद्र भावनाएं मेरे हृदय में भर दो ।
१. अज्ञान अविद्या के चक्कर में फंस न जाऊं।
हे प्रेरक देव मेरे मन के अंधेरे हर दो.... ॥
२. अपनी लाभ-हानि को तेरी प्रेरणा से ।
अच्छी तरह से समझू बुद्धि मुझे प्रखर दो.... ॥
३. विषयवासना की जब सेना आगा रोके ।
संयम से परास्त कर दूं शक्ति हे ईश्वर दो....!!
४. कट्टर दिलों के अन्दर भी 'प्रेमी' प्रेम भर दो ।
वाणी में हो मधुरता करूणाभरी नजर दो....॥
भजन नं ५५
(तर्ज-बाबुल की दुआएं लेती जा....)
हर बात को तुम भूलो भले, माँ बाप को तुम मत भूलना । उपकार इनके लाखों हैं इस बात को तुम मत भूलना ॥ १. धरती पर देवों को पूजा, भगवान् को लाख मनाया है । तब तेरी सूरत पाई है, संसार में तुझको बुलाया है । इन पावन लोगों के दिल को, पत्थर बनकर मत तोड़ना.... ॥ २. अपने ही पेट को काटा है और तेरी काया बनाई है । अपना हर कौर खिलाया तुझे, तब तेरी भूख मिटाई है । इन अमृत देने वालों के जीवन में जहर मत घोलना....।। ३. जो चीज भी तूने मांगी है, उस चीज को तूने पाया है । हर जिद को लगाया सीने से बड़ा स्नेह तुझसे लगाया है। इन प्यार लुटाने वालों का तुम प्यार कभी मत भूलना....!! ४. चाहे लाख कमाई धन-दौलत, ये बंगला कोठी बनाई है । माँ-बाप ही नाखुश हैं तेरे, बेकार ये सारी कमाई है । ये लाख नहीं ये खाक हैं सब, इस राज को तुम मत भूलना....! गीले में सदा ही सोए हैं, सूखे में तुझको सुलाया है । बाहों का बनाकर के झूला, तुझे दिन और रात झुलाया है। इन निर्मल-निश्छल आँखों में इक आंसू भी मत घोलना....!! ६. पलकों पे बिठाया है तुझको, तुझे हरदम रखा पनाहों में । कलियों का कर बिछौना तेरा, फूलों को बिछाया राहों में । इन प्यारे लोगों की राहों में, तू काँटे मत छोड़ना....!! ७. घर गाड़ी और व्यापार मिले, अनमोल रत्न मिल जायेंगे । हर चीज मिलेगी दौलत से, माँ-बाप न मिलने पायेंगे । भगवान् से भी पावन हैं जो इन चरणों को मत भूलना....!! ८. हर चीज मिले इस दुनियाँ में माँ-बाप नहीं मिल पाते हैं। माँ-बाप की सेवा जो करते, सन्तान की सेवा पाते हैं । जैसी करणी वैसी भरणी, इस न्याय को तुम मत भूलना ....!!
भजन नं ५५
(तर्ज-बाबुल की दुआएं लेती जा....) हर बात को तुम भूलो भले, माँ बाप को तुम मत भूलना । उपकार इनके लाखों हैं इस बात को तुम मत भूलना || १. धरती पर देवों को पूजा, भगवान् को लाख मनाया है । तब तेरी सूरत पाई है, संसार में तुझको बुलाया है । इन पावन लोगों के दिल को पत्थर बनकर मत तोड़ना.... ॥ २. अपने ही पेट को काटा है और तेरी काया बनाई है । अपना हर कौर खिलाया तुझे, तब तेरी भूख मिटाई है। इन अमृत देने वालों के जीवन में जहर मत घोलना.... ।। ३. जो चीज भी तूने मांगी है, उस चीज को तूने पाया है । हर जिद को लगाया सीने से बड़ा स्नेह तुझसे लगाया है। इन प्यार लुटाने वालों का तुम प्यार कभी मत भूलना....॥ ४. चाहे लाख कमाई धन-दौलत, ये बंगला कोठी बनाई है। माँ-बाप ही नाखुश हैं तेरे, बेकार ये सारी कमाई है । ये लाख नहीं ये खाक हैं सब, इस राज को तुम मत भूलना....!! ५. गीले में सदा ही सोए हैं, सूखे में तुझको सुलाया है । बाहों का बनाकर के झूला, तुझे दिन और रात झुलाया है। इन निर्मल-निश्छल आँखों में इक आंसू भी मत घोलना....!! ६. पलकों पे बिठाया है तुझको, तुझे हरदम रखा पनाहों में । कलियों का कर बिछौना तेरा, फूलों को बिछाया राहों में । इन प्यारे लोगों की राहों में, तू काँटे मत छोड़ना....॥ घर गाड़ी और व्यापार मिले, अनमोल रत्न मिल जायेंगे । हर चीज मिलेगी दौलत से माँ बाप न मिलने पायेंगे । भगवान् से भी पावन हैं जो, इन चरणों को मत भूलना....॥ ८. हर चीज मिले इस दुनियाँ में माँ बाप नहीं मिल पाते हैं । माँ-बाप की सेवा जो करते, सन्तान की सेवा पाते हैं । जैसी करणी वैसी भरणी, इस न्याय को तुम मत भूलना ....!!
भजन नं ५६
(तर्ज-मुझे इश्क....)
जिस घर में एक दूजे की बात जाए मानी ।
उस घर में कभी ना आए कोई भी परेशानी ।
१. आकाश में नहीं है स्वर्गों की कोई दुनियां ।
बेकार के भ्रम में भटकी हुई है दुनियां ।
वोही घर है स्वर्ग जिसमें होती है मधुर वाणी....॥
२. माता-पिता की सेवा ही फर्ज है हमारा ।
माँ-बाप से ही जग में नामोनिशां हमारा ।
माता-पिता की आज्ञा जाती जहाँ पे मानी...॥
३. सन्तान पैदा करके जो आजाद छोड़ देते ।
माँ-बाप ऐसे इक दिन सर को पकड़ के रोते ।
बच्चों पे शुरू से ही रखते जो निगरानी....॥
४. प्रयोग में ना लाओ तराजू को शादियों में ।
घर फूंक डाले कितने विजय सौदे की शादियों ने।
समझें जहाँ बहु को ही दहेज घर के स्वामी....॥
भजन नं - ५७
(प्रार्थना )
अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में है जीत तुम्हारे हाथों में, है हार तुम्हारे हाथों में ॥ १. मेरा निश्चय है एक यही, एक बार तुम्हें पा जाऊँ में अर्पण कर जगती भर का, सब प्यार तुम्हारे हाथों में। २. या तो मैं जग से दूर रहूं, और जग में रहूं तो ऐसे रहूं।
३. इस पार तुम्हारे हाथों में, उस पार तुम्हारे हाथों में । मुझ में तुझ में भेद यही, मैं नर हूं तुम नारायण हो । मैं हूं संसार के हाथों में, संसार तुम्हारे हाथों में । ४. दृग्-बिन्दु बह रहे हैं भगवान् और विरह-वियोग सताय रहा।
मुझ पूजक की इक रंग-रंग का हो तार तुम्हारे हाथों में।
भजन नं ५८
वेद को पहना पढ़ाना चाहिए
वेद को सुनना सुनाना चाहिए ।
१. वेद के अनुकूल ही हे आर्यो ।
आचरण अपना बनाना चाहिए.... ॥
२. छल-कपट से पूर्ण वातावरण में ।
प्रेम की गंगा बहाना चाहिए....!!
३. मत भलाई तुम किसी की भूलना ।
हो भला कर भूल जाना चाहिए....॥ ४. लाख कहने से न कुछ होगा प्रकाश । कार्य कुछ करके दिखाना चाहिए....॥
भजन नं ५९
(तर्ज-होठों को....)
एक बार भजन करले, मुक्ति का यत्न करले । छुट जाएगा जन्म-मरण, प्रभु का सुमिरन करले । १. ये मानव का चोला, हर बार नहीं मिलता । गिर गया जो डाली से, वो फूल नहीं खिलता । मौका है ये जीवन का, गुलजार चमन करले.... ॥
२. नर इन कानों से सुन, तू ऋषियों की वाणी ।
मन को ठहरा करके, बनजा आत्मज्ञानी । जिह्वा तो चले मुख में, ये ओम्जपन करले....॥ ३. वेदों में गूंज रही, मंत्रों की मधुर ध्वनियाँ । बलिदान की कड़ियों में, तू गूंथ ले ये कड़ियाँ । अब तो प्रभु के आगे, नीची गर्दन करले.... ॥
४. इस मैली चादर में हैं दाग लगे कितने । पर ज्ञान की साबुन में, हैं झाग भरे कितने । धुल जाएगी सब स्याही, उजला तन-मन करले....॥
भजन नं ६०
(तर्ज-दिल के अरमां...)
जब तेरी डोली निकाली जाएगी। बिन मुहूर्त के उठाली जाएगी।
९. जर सिकन्दर क्या यहाँ पर रह गया। मरते दम लुकमान भी यह कह गया। ये घड़ी हरगिज न टाली जाएगी | १२. उन हकीमों से यह पूछो बोलकर दावा करते थे किताबें खोलकर।
यह दवा हरगिज न खाली जाएगी । ३. क्यों गुलों पर हो रहे बुलबुल निसार पीछे माली है खड़ा खबरदार।
मारकर गोली गिराली जाएगी। ४. ये मुसाफिर क्यों पसरता है यहाँ यह किराए का मिला तुझको मकाँ।
कोठडी खाली कराली जाएगी। ५. धर्मराज जब लेगा तेरा हिसाबा फिर वहाँ पर जब वहीं तेरी निकाली जाएगी ॥ जवाब देगा जनाब।
भजन नं ६१
(तर्ज देख तेरे संसार की....)
माता-पिता गुरु प्रभु चरणों में प्रणाम बारम्बार ।
हम पर किया बड़ा उपकार हम पर किया बड़ा उपकार ।
१. माता ने जो कष्ट उठाया उसका ऋण जाये ना कभी चुकाया। अंगुली पकड़कर चलना सिखाया, ममता की दी शीतल छाया। जिसकी गोद में पलकर के हम बड़े बने हुशियार हम पर... ॥ २. पिता ने हमको योग्य बनाया, कमा कमाकर अन्न खिलाया। पढ़ा लिखा गुणवान् बनाया, जीवन पथ पर चलना सिखाया।
जोड़-जोड़ अपनी सम्पत्ति में, बना दिया हकदार हम पर.... ॥ ३. वैदिक ज्ञान ऋषि ने बताया, अन्धकार सब दूर भगाया । हृदय में भक्ति दीप जलाकर, सुखी रहने का मार्ग बताया । बिना स्वार्थ ही कृपा करे, देखो ऋषि कितने उदार हम पर... ॥
४. प्रभुकृपा से नरतन पाया, सन्त मिलन का साज सजाया। बल बुद्धि और विद्या देकर, सब जीवों में श्रेष्ठ बनाया । जो प्रभु की शरण में आता, कर देते उद्धार हम पर....।।
भजन नं ६२
ओम् सुखकन्द से सच्चिदानन्द से याचना है श्रेयपथ पर चलूं कामना है।
कृत कुकर्मों की जब याद आती, आंखें हैं अश्रुधारा मन में सन्ताप की, घोर अनुताप की, वेदना है. ॥
बहाती।
पाया नर तन न पर साधना की, कुछ भी न ईश आराधना की।
मन में तृष्णा भरी, काम मद लोभ की, वासना है ॥
भक्त जन की सुनो करूण कविता, विश्व दुरितों को हे देव सविता।
दूर कर दीजिए, भद्र भर दीजिए, प्रार्थना है ॥
स्वस्ति पन्थामनुचरेम भगवन् ? सूर्य चन्द्र के तुल्य भगवन् ।
दान दूँ ज्ञान लूँ अघ्नता संग रहूँ प्रार्थना है ॥
ले चलो सुपथ पर हे सर्वज्ञाता, कुटिल अघ से बचूँ सिर निवाता ।
नाथ दो आत्मबल, जिससे होवें सफल, साधना
है॥
भजन नं ६३
(वैदिक आरती)
ओम् जय जगदीश पिता, प्रभु जय जगदीश पिता । विश्व विरंच विधाता, जगत्राता सविता ॥ ओं ॥ १. अनन्त अनादि अजन्मा, अविचल अविनाशी । सत्य सनातन स्वामी, शंकर सुख राशी ॥ ओं ॥ २. सेवकजन सुखदायक, जननायक तुम हो । शुभ सुख शान्ति सुमंगल, वरदायक तुम हो ॥ औं ॥
३. मैं सेवक शरणागत, तुम मेरे स्वामी |
हृदय पटल में प्रगटो, प्रभु मेरे अन्तर्यामी ॥ ओं ॥
४. काम, क्रोध, मद, मोह, कपट, छल, व्यापे नहीं मन में।
लगन लगे मम मन की, गुण तेरे वर्णन की ॥ औं ।
५. नित्य निरंजन निशदिन तेरा ही जाप करें ।
तव प्रताप से स्वामी, तीनों ही ताप हरें ॥ ओं ॥
६. पतित उद्धारक तारण, शरणागत तेरी ।
भूले ना भटके भ्रम में, निर्मल मति मेरी ॥ ओं।
७.
शुद्ध बुद्धि से मन में, तेरा ही वर्णन करें ।
सब विधि छल बल तज के, तेरी शरण पड़े ॥ ॐ ॥
भजन नं ६४
ओम् जय जगदीश हरे, पिता जय जगदीश हरे ।
भक्त-जनन के संकट, क्षण में दूर करे। औं जय ॥
१. जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का। पिता दुःख ॥
सुख-सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का ॥ औं जय ॥
२. मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी। पिता शरण ॥
तुम बिन और न कोई, आश करूँ जिसकी। औं जय ॥
३. तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। पिता तुम ॥
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी ओं जय ॥
४. तुम करूणा के सागर, तुम पालनकर्ता। पिता तुम ॥
मैं मूरख अज्ञानी, कृपा करो भर्त्ता ॥ ओं जय ॥
५. तुम हो एक अगोचर सबके प्राणपति | पिता सबके ॥
किस विधि मिलूँ दयामय, दीजे मोहि सुमति ॥ ओं जय ।।
६. दीनबन्धु दुखहर्त्ता तुम रक्षक मेरे ॥ पिता तुम ॥
करूणाहस्त बढ़ाओ, शरण पड़ा तेरे ॥ औं जय ॥
७. विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। पिता पाप ||
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा ॥ ओं जय ॥
भजन नं ६५ -
धरती की शान, तू है मनु की सन्तान तेरी मुट्ठियों में बन्द तूफान है रे 55 मनुष्य तू बड़ा महान् है भूल मत ।
१. तू जो चाहे पर्वत पहाड़ों को फोड़ दे, तू जो चाहे नदियों के मुख को भी मोड़ दे। तू जो चाहे माटी से अमृत निचोड़ दे, तू जो चाहे धरती से अम्बर को जोड़ दे। अमर तेरे प्राऽऽऽण, अमर तेरे प्राण मिला तुझको वरदान ।
तेरी आत्मा में स्वयं भगवान् है रे ऽ मनुष्य तू.....! २. नैनों में ज्वाल, तेरी गति में भूचाल, तेरी छाती में छिपा महाकाल है। धरती के लाल, तेरा हिमगिरि-सा भाल, तेरी भृकुटी में ताण्डव का ताल है।
निज को तू जा 5555 न, निज को तू जान जरा शक्ति पहचान। तेरी वाणी में युग का आह्वान हैरे ऽ मनुष्य तू....॥ ३. धरती-सा धीर तू है अग्नि-सा वीर, अरे तू जो चाहे काल को भी थाम ले। पापों का प्रलय रुके, पशुता का शीश झुके, तू जो अगर हिम्मत से काम ले। गुरू-सा मंतिमा 5555 न, गुरू-सा मतिमान् पवन-सा तू गतिमान् । तेरी नभ से भी ऊंची उड़ान है रे ऽ मनुष्य तू....॥
भजन नं ६६
उठो दयानन्द के सिपाहियो समय पुकार रहा है। देशद्रोह का विषधर फन फैला फुंकार रहा है। टेक ॥ १. उठो विश्व की सूनी आँखें काजल मांग रही हैं । उठो अनेकों द्रुपद-सुताएँ आँचल मांग रही हैं । मरघट की पनघट सा करदो जग की प्यास बुझा दो । भटक रहे जो मरूस्थलों में उनको राह दिखा दो ।
गले लगा लो उनको जिनको जग दुत्कार रहा है ॥ २. तुम चाहो तो खारे जल को सोम बना सकते हो । तुम चाहो तो पत्थर को भी मोम बना सकते हो। तुम चाहो तो बंजर में भी बाग लगा सकते हो । तुम चाहो तो पानी में भी आग लगा सकते हो ।
जातिवाद जग की नस-नस में जहर उतार रहा है। ३. याद नहीं क्या भूल गए जो ऋषि को वचन दिया था। शायद वादा याद नहीं जो आपने कभी किया था। वचन दिया था ओम्-पताका कभी न झुकने देंगे। हवन कुण्ड की अग्नि घरों से कभी न बुझने देंगे।
लहू शहीदों का गद्दारों को धिक्कार रहा है । ४. कैसे आग बुझा पाओगे आग बहुत फैली है। 'उजली उजली दिखने वाली हर चादर मैली है , लेखराम का लहू पुकारे आँख जरा तो खोलो । एक बार मिलकर सारे ऋषि दयानन्द की जय बोलो। वेदज्ञान का 'व्यथित सूर्य तुम्हें निहार रहा है ।
भजन नं - ६७
भगवान आर्यों को पहली लगन लगादे । वैदिक धर्म के खातिर मिटना इन्हें सिखादे । १. फिर राम कृष्ण निकले घर-घर गली-गली से। अर्जुन व कर्ण जैसे योद्धा रणस्थली से । भीष्म से ब्रह्मचारी और भीम महाबली से । गौतम कणाद जैमिनि ऋषिवर पतञ्जलि से
फिर से कोई दयानन्द जैसा ऋषि दिखादे || २. ऐसे हों लाल पैदा खेलें जो गोलियों से । भूमि को तृप्त कर दे श्रद्धा की झोलियों से । गूंजे ये देश मेरा शेरों की बोलियों से । बिस्मिल गुरू भगतसिंह वीरों की टोलियों से इनको वतन की खातिर फांसी पे भी हंसादे ।
३. कोई लेखराम जैसा गुरूदत्त दयाल होवे । कोई श्रद्धानन्द होवे कोई हंसराज होवे । बढ़ती बीमारियों का फिर से इलाज होवे । नेतृत्व जिनका पाकर उन्नत समाज होवे । बेधड़क लाजपत-सा फिर से 'पथिक' बनादे ।
भजन नं ६८
(तर्ज- हमने गाँव के पनघट पर... ..)
देश की खातिर जो सीनों पर खा-खा मर गए गोलियाँ | उनके बलिदानों की ये नेता बोल रहे हैं बोलियाँ | ये कैसा सितम है ये कैसा सितम है । १. ये रेल में थे हम जेल में थे, ये सहेल में थे हम दहेल में थे। यही राज पर कब्जा कर गए, जो अंग्रेज की गैल में थे। हम सब धक्कापेल में थे, कहीं जलाए तेल में थे । राजगुरू सुखदेव, भगतसिंह फांसी चढ़ गई टोलियाँ.... ॥ २. एक ऊधम था वो क्या कम था, मानो बम था एटमबम था। बाप का बदला लेकर छोड़ा, उसी बहादुर का दम था।
इक्कीस वर्ष का मातम था, उसको यही रजोगम था। लन्दन में जाकर के जिसने खेली खून से होलियाँ.... ॥ ३. नौजवान गए बलवान् गए, किसान गए विद्वान गए । नहीं आज तक आने पाए, बहुत वीर अण्डमान गए। कर न्यौछावर जान गए, छोड़ के हिन्दुस्तान गए । मारा-मारा फिर बेचारा सुभाष लेकर टोलियाँ....॥ ४. बलकारी था तपधारी था. सदाचारी था न्यायकारी था। स्वतंत्रता की नीव घरी, वो दयानन्द ब्रह्मचारी था। सच्चा देव पुजारी था, देशभक्त हितकारी था । 'खेमचन्द एक लालबहादुर अपने हाथ से खो लिया....!
भजन नं ६९ ओ३म् का सुमिरन किया करो, प्रभु के सहारे जिया करो। जो दुनियां का मालिक है, नाम उसी का लिया करो ॥ सुर दुर्लभ मानव तन तूने, बड़े भाग्य से पाया। •विषयों में फंसकर क्यों बन्दे हीरा जन्म गमाया ॥ दुष्ट संग ना किया करो, स्वजनों से गुण लिया करो, जो दुनियां का मालिक है, नाम उसी का लिया करो ॥१॥ पता नहीं कब रूक जाये यह चलते-चलते स्वासा । इक क्षण भर में खत्म होय यह जग का सभी तमासा ॥ सुबह-शाम रट लिया करो, याद प्रभु की किया करो, जो दुनियां का मालिक है नाम उसी का लिया करो ॥ २ ॥ है मनुष्य मात्र से प्रेम बढ़ाना सबमें प्रभु समाया है।
मिलकर रहना सब हैं अपने कोई नहीं पराया है।
दुख ना किसी को दिया करो, द्वेष भाव ना किया करो,
जो दुनियां का मालिक है, नाम उसी का लिया करो ॥३॥
सच्चा सुख है प्रभु भक्ति में बात न समभो झूठी।
वही मोक्ष पद पाते, पीते जो ओ३म् नाम की बूटी ॥
ओ३म् नाम रस पिया करो, 'राघव भूल न किया करो,
जो दुनियां का मालिक है नाम उसीका लिया करो ॥४॥
भजन नं ७०
काबील नहीं हूं
तेरी मेहरबानी का है बोझ इतना
जिसे मैं उठाने के काबिल नहीं हूं। में आ तो गया हूं मगर जानता हूँ तेरे दर पे आने के काबिल नहीं हूं ॥ ये माना कि दाता हो तुम कुल जहां के
मगर झोली आगे फैलाऊं कैसे जो पहले दिया है वो कुछ कम नहीं है,
मैं जियादा उठाने के काबिल नहीं हूं ॥१॥ तुम्हीं ने अता की मुझे जिन्दगानी, मगर तेरी महिमा फिर भी मैंने न जानी
कर्जदार तेरी दया का हूं इतना, जिसे मैं चुकाने के काबिल नहीं हूं ॥ २॥
जमाने की चाहत में खुद को मिटाया
मोह-माया में रहके तुझको को भुलाया
गुनहगार हूं मैं सजावार इतना, तुझे मुंह दिखाने के काबिल नहीं हूं ॥ ३॥
तमन्ना यही है सर को झुका लूँ
तेरा दर्श इक बार जी भर के पा लूँ सिवा दिल के टुकड़ों के अय मेरे दाता, मैं कुछ भी चढ़ाने के काबिल नहीं हूं।
॥ मुक्तक ।।
भय संकट में सुख के तट में अखिलेश्वर ओ३म् नाम रटना। उर में उत्साह अपूर्व लिये संमरागण में, निर्भय डटना । श्रुतिवेद प्रचार प्रसारण के पथ से न 'प्रकाश' कभी हटना दिल्ली में रहो कलकत्ता रहो, अजमेर रहो या रहो पटना।
भजन नं ७१
स्वर्ग की भलक
तर्ज- (मार दिया जाये छोड़ दिया......) वेद पढ़ा जाये, जहां हवन किया जाये, ऐसे परिवार को ही स्वर्ग कहा जाये । सत्य-रग रग में जिनके रमा है, खुश रहता है उनसे विधाता। प्रेम सीने में जिनके नहीं है, उनको ईश्वर नजर दूर आता। कुछ सुहाता नहीं, सत्संग भाता नहीं, जिन्दगी पशुओं से बदतर बिताये ॥१॥ कर्म नेकी के जो कर गये हैं,
विश्व में नाम उनका अमर है।
उनके जीवन की ज्योति से अनगिन भूले पथिकों ने पाई डगर है। धर्म छोड़ा नहीं, नियम तोड़ा नहीं, जाति उनके सदा गीत गाये ॥२॥ अन्न भूखों को नंगों को कपड़ा,
जो देते रहे और देंगे। दया हृदय में जिनके बसी है,
सहा अन्याय और न सहेंगे।
संकटो में कभी, झंझटों में कभी,
निर्भय बिचरे नहीं घबराये ॥३॥
सबके घट-घट बसे प्राण प्यारा,
सारा संसार है यह उसी का।
स्वयं स्वास्थ में फंसकर जो बन्दा,
दिल दुखाये नहीं जो किसी का ।
स्वप्न में भी कभी, दोष आते नहीं, 'राघव'
मानव वही कहलाये ॥४॥
भजन नं ७२
गीत (तर्ज-बहारो फूल बरसाओ) दुखाये दिल किसी का जो, भला वो आदमी क्या है। किसी के काम ना आये, भला वह जिन्दगी क्या है।
बड़े ही भाग्य व शुभ कर्म से यह तन मनुज पाया। ये हीरा जन्म पाकर के किसी को सुख न पहुंचाया ॥ कर्म नेकी के करने में भला शरमिन्दगी क्या है। में शाक मेवा व अन्नादि है कितने फल मधुर सुन्दर ॥ न भाये मूक पशुओं को खा रहा पेट के अन्दर । खुदा के दर पर आकर के भला वह बन्दगी क्या है ॥ बदी के शूल तजकर फूल जो नेकी के चुनते हैं। सफल जीवन बनाते हैं न पीछे शीश धुनते हैं क्योंकि दुष्कर्म से बढ़कर भला और गन्दगी क्या है। दुखाये दिल किसी का जो भला वह आदमी क्या है।
॥ मुक्तक ।।
नैनों के जो नेह नीर से घाव और के धोते हैं। दुख सह के जो स्वयं और को सुख के साज संजोते हैं। ऐसे वीर महा मानव जब विदा जगत से होते हैं। खुद तो हंसते हैं पर उनके लिये लोग सब रोते हैं।।
भजन नं ७३
सौ बार जन्म लेंगे, सौ बार फना होंगे। अहसान दयानन्द के, फिर भी न अदा होंगे। गुजरात की धरती से सूरज की किरण फूटी। अज्ञान अविद्या के दानव की कमर टूटी।
भारत पुरनुर हुवा अब अरजो समा होंगे ॥१॥ • निराकार की पूजा को जीवन में उतारा था। पाषाण का अभिनन्दन कब उसको गवारा था। मुंह मोड़ लिया जिनसे पत्थर के खुदा होंगे ॥२॥ आकाश में रोशन हैं ये शमसो कमर जबतक । दिन-रात हैं ये जबतक, ये शामो शहर जब तक अफसाने दयानंद के दिल से न जुदा होंगे ॥३॥ वीर आर्यमुसाफिर से सैनानी दिये हमको।
और स्वामी श्रद्धानन्द से बलिदानी दिये हमको। खूं जिनकी शहादत के हर गम की दवा होंगे ॥४॥ स्वागत के लिये जिनके पाषाण थे या कंकर। गम खाके बने हनुमन्त, विष पीके बने शंकर । फूल उनके मुकद्दर में होंगे भी तो क्या होंगे ॥५॥
॥ मुक्तक ।
मान होता नहीं धन-धाम से।
मान होता न सुन्दर चाम से ॥
मान ऊंची डिगरियों से नहीं। मान होता सदा शुभ काम से ॥
भजन नं ७४
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(तर्ज-मैं मायके चली जाऊंगी तू...) मानव जीवन पाकर के दुष्कर्म मत करियो ।
वहां पेश किसी की चले नहीं, और दाल किसी की गले नहीं।
कर्मों के फल देने वाले भगवान से डरियो । तू छुपकर पाप कमायेगा, वहां लिखा वही में पायेगा। पुस्तक में जो लिखा गया, तू कहीं नहीं बच पायेगा। जैसा कर्म किया वैसा ही फल उसका भरियो। कर्मों के फल देने वाले भगवान से डरियो ॥१॥ मोह-ममता, माया ने अपना, बिछा रखा है जाल यहां। फंसे हुए इसके फन्दे में, धनिक वैद्य भूपाल यहां। यह सब का मन मोह लेती है, और नहीं निकलने देती है। संभल के रहना माया के चक्कर में मत परियो । कर्मों के फल देने वाले भगवान से डरियो। ॥२॥ विषयों की आंधी ने जग में सब के पैर उखाड दिए। बड़े-बड़े राजा महाराजा, योगी-सन्त पछाड़ दिए। यह कभी न टालमटोल करे, पल भर में बिस्तर गोल करे। कहे स्वरूपानन्द, धर्म कर भवसागर तरियो । कर्मों के फल देने वाले भगवान से डरियो ||३||
॥ मुक्तक ।
जरूरी सभी काम अपने किया कर जिला और को साथ खुद भी जिया कर ॥ दिया ये मनुज जन्म जिसने अमोलक । मधुर नाम उस ईश का भी लिया कर ॥
भजन नं ७५
हमारे देश की महिमा
तर्ज- हमें तो लूट लिया मिलके हुस्न वालों ने (कव्वाली)
हमारे देश की महिमा बड़ी सुहानी है।
सब से निराली है सब से पुरानी है।
कभी इस देश का दुनियां पे राज होता था । यहां की रीत ही सब का रिवाज होता था । हजारों सैंकड़ों गऊएं घरों में रहतीं थीं । तभी तो दूध की नदियां यहां पे बहतीं थीं। पड़ोसी इस तरह आपस में प्यार करते थे । सभी इक दूसरे पे जां निसार करते थे । किसी दरवाज़े को ताला न कोई होता था । हरेक आदमी बेखौफ हो के सोता था ।
न जुआरी न शराबी न चोर होता था। ऐसा वातावरण ही चहुं ओर होता था। हमारे देश.....
हमारा देश ही मालिक था हर खजाने का । फ़खर हासिल था इसे देव घर कहाने को । जहां में एक ही यह दर था सर झुकाने को ।
हरेक ज्ञान का दाता इसे बताते थे । कलाएं सीखने सारे यहीं पे आते थे ऋषि मुनियों का यहीं पे निवास होता था । ज्ञान भण्डार भरा जिनके पास होता था ।
दिशाएं गूंजती थीं वेद की ऋचाओं से। सुगन्धि फैलती थी हवन की हवाओं से। हमारे देश .....
यहीं पे राम का आदर्श नज़र आया है ।
यहीं पे कृष्ण ने गीता का गीत गाया है ।
यहीं पे भरत से भाईयों के लगे मेले हैं ।
इसी की गोद में अर्जुन व भीम खेले हैं ।
हैं द्रोण व भीषम से पुरूष लासानी ।
दधीचि, हरिश्चन्द्र और करण से दानी ।
कहीं हनुमान कहीं विदुर जी की भक्ति है ।
कहीं पर ब्रह्मचर्य की अमोघ शक्ति है । लुटाई दौलतें जिस पर सदा बहारों ने। किया सिजदा इसी धरती को चाँद तारों ने हमारे देश.....
यहाँ की देवियां विदुषी महान होतीं थीं । तेज की लाट व अग्नि समान होतीं थीं । सती सीता, अनुसूया, शकुन्तला जैसी । लोपामुद्रा, शुभा सुलभा, मदालसा जैसी । गार्गी, भारती जब उठ के बात करती थीं। तो याज्ञवल्क्य व शंकर को मात करती थीं । जभी कुन्ती या कौशल्या की याद आती है । तभी सम्मान में गर्दन मेरी झुक जाती है । 'पथिक' इतिहास में यह खोज हमने भारी की। सदा पूजा हुई इस देश की सन्नारी की। हमारे देश...
भजन नं ७६
प्यारा ओम्
तर्ज-रघुपति राघव राजा राम राजा राम सीता राम नाम प्रभु का प्यारा ओम् प्यारा ओम् प्यारा ओम् । दाता पालनहारा ओम् प्यारा ओम् प्यारा ओम् ।
दूध में है घी सितार के सुरों में राग है ।
तेल है तिलों में जैसे पत्थर में आग है ।
कण-कण में विस्तारा ओम् प्यारा ओम् प्यारा ओम् । जो विराजमान है आकाश में पाताल में ।
एक सा भविष्य वर्तमान भूतकाल में । अमृत रस की धारा ओम् प्यारा ओम् प्यारा ओम् । नाम प्रभु का प्यारा ओम्
ओम् इष्टदेव पूजनीय है जहान का और कहीं दूसरा न कोई जिसकी शान का ।
कुल दुनियां से न्यारा ओम् प्यारा ओम् प्यारा ओम् । नाम प्रभु का प्यारा ओम्.. सूर्य और चांद जिसकी आरती उतारते । नेति नेति कहके जिसको वेद भी पुकारते । 'पथिक' सब का सहारा ओम् प्यारा ओम् प्यारा ओम् नाम प्रभु का प्यारा ओम्......
भजन नं ७७
दया कर दो
तर्ज-पितु मातु सहायक स्वामी सखा तुम ही इक नाथ हमारे हो १. प्रभु जी इतनी सी दया कर दो हमको भी तुम्हारा प्यार मिले,
कुछ और भले ही मिले न मिले प्रभु दर्शन का अधिकार मिले |
२. जिस जीवन में जीवन ही नहीं वह जीवन भी क्या जीवन है ।
जीवन तब जीवन बनता है जब जीवन का आधार मिले ।
३. सब कुछ पाया इस जीवन में बस एक तमन्ना बाकी है, ।
हर प्रेम पुजारी को अपने मन मन्दिर में दातार मिले |
४. जिसने तुम से जो कुछ मांगा उसने है वही तुमसे पाया, ।
दुनियां को मिले दुनियां लेकिन भक्तों को तेरा दरबार मिले ।
५. हम जन्म जन्म के प्यासे हैं और तुम करूणा के सागर हो, ।
करूणानिधि से करूणा रस की इक बूंद हमें इक बार मिले ॥
६. इस मार्ग पर चलते चलते सदियां ही नहीं युग बीत गए ।
मिल जाए 'पथिक' मन्ज़िल अपनी हमको जो तुम्हारा द्वार मिले।
भजन नं ७८
ज्ञान का सागर
ज्ञान का सागर चार वेद यह वाणी है भगवान की ।
इसी से मिलती सब सामग्री जीवन के कल्याण की
ज्ञान का सागर चार वेद......... सब सच्ची विद्याएं जग में प्रकट वेद से होती हैं ।
यहीं से जाकर सब नदियां पृथ्वी का आंगन धोती हैं। उसी को जीवन सार मिला जिसने इसकी पहचान की। ज्ञान का सागर चार वेद.....
सृष्टि एक अदालत है और न्यायाधीश विधाता है। यहीं पे ही हर प्राणी अपने कर्मों का फल पाता है। वेद के अन्दर सब रचना है विधि के अमर विधान की। ज्ञान का सागर चार वेद....
वेद का पढ़ना और पढ़ाना परम धर्म कहलाता है। सुनना और सुनाना भी कर्त्तव्य बताया जाता है। वेद ही असली दौलत है दुनियां के हर इनसान की । ज्ञान का सागर चार वेद........
धन्य धन्य भारत भूमि जिस पर वेदों का गान हुआ।
वेद का अमृत पिया पिलाया तब यह देश महान हुआ।
'पथिक' पुण्य भूमि है यह तो ऋषियों की सन्तान की।
ज्ञान का सागर चार वेद........
भजन नं ७९
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कहां लौट जाए
तर्ज़- यशोमती मैय्या से बोले नन्दलाला । गति जीव आत्मा की कोई समझाए । कहां से यह आए कहां लौट जाए ।
कहां लौट जाए। गति जीव...... कभी इसका आना जाना किसी ने न जाना । कहां का निवासी है यह कहां है ठिकाना ।
किसी को भी कोई अपना पता न बताए । कहां लौट जाए। गति जीव...... मिली एक नगरी इस को अयोध्या निराली । जो है आठ चक्रों और नौ द्वारों वाली । सिर्फ चार दिन ही इस का बादशाह कहाए । कहां लौट जाए। गति जीव......
प्रभु ने हज़ारों तोहफ़े बना कर दिए हैं। कुदरती नज़ारे जग में इसी के लिए हैं। इन्हें छोड़ क्यों जाता है समझ में न आए।
कहां लौट जाए। गति जीव.......
'पथिक' यह प्रभु की माया प्रभु जानता है ।
प्रभु
के सिवा न कोई पहचानता है ।
जो महान् शक्ति सारे विश्व को चलाए ।
कहां लौट जाए। गति जीव......
भजन नं - ८० भगवान् के द्वारे भक्त
तर्ज करती हूँ तुम्हारा व्रत में स्वीकार करो मां ।
भगवान तुम्हारे दर पे भक्त आन खड़े हैं ।
संसार के बन्धन से परेशान खड़े हैं ।
ओ मालिक मेरे ! ओ मालिक मेरे......
संसार से निराले कलाकार तुम्हीं हो ।
सब जीव जन्तुओं के सृजनहार तुम्हीं हो ।
तुझ परम प्रभु का मन में लिए ध्यान खड़े हैं।
संसार के बन्धन से परेशान....ओ मालिक मेरे..
तुम
वेद ज्ञान दाता पिताओं के पिता हो ।
वह राज़ कौनसा है कि जो आपसे छिपा हो ।
हम तो हैं अनाड़ी बालक बिना ज्ञान खड़े हैं ।
संसार के बन्धन से परेशानओ मालिक मेरे .....
सुनकर विनय हमारी स्वीकार करोगे ।
मंझधार में है नैया प्रभो पार करोगे ।
हर कदम कदम पर आगे ये तूफ़ान खड़े हैं।
संसार के बन्धन से परेशान....ओ मालिक मेरे..
दुनियां में आप जैसा कहीं और नहीं है।
इस ठौर के बराबर कहीं ठौर नहीं है ।
अपनी तो 'पथिक' मन्ज़िल है जो पहचान खड़े हैं।
संसार के बन्धन से परेशान.... ओ मालिक मेरे.
भजन नं ८१ -
सर अपना झुका देना
तर्ज- ऐ मेरे दिले नादां तू ग़म से न घबराना । मानव तू अगर चाहे दुनियां को हरा देना । बस ईश्वर के दर पर सर अपना झुका देना। मानव तू अगर चाहे.....
राजी हो प्रभु जिस में वह काम सही होगा।
भगवान जो चाहेगा दुनियां में वही होगा ।
उसे अपना बना कर के उलझन को मिटा देना।
मानव तू अगर चाहे.......
रक्षक है अनार्थों का दुखियों का सहारा है।
भव पार किया उसको जिस ने भी पुकारा है।
पल भर के लिए उसको दिल से न भुला देना।
मानव तू अगर चाहे..... धरती और सागर के रत्नों को जो पाना हो । आकाश में उड़ना हो पाताल में जाना हो । डोरी परमेश्वर को पहले पकड़ा देना । मानव तू अगर चाहे......
चाहेंगी सदा तुझ को खुशियाँ और आशाएं। चूमेंगी चरण तेरे सब ओर सफलताएं । जीवन को 'पथिक' उसकी राहों पे लगा देना। मानव तू अगर चाहे.......
भजन नं ८२
श्रद्धा रूपी भेंट
नमस्कार भगवान तुम्हें भक्तों का बारम्बार हो । श्रद्धा रूपी भेंट हमारी मंगलमय स्वीकार हो । तुम कण कण में बसे हुए हो तुझ में जगत समाया है। में तिनका हो चाहे पर्बत हो सभी तुम्हारी माया है। तुम दुनियां में हर प्राणी के जीवन का आधार हो ।
श्रद्धा रूपी भेट हमारी.......
सब के सच्चे पिता तुम्हीं हो तुम्हीं जगत की माता हो।
भाई बन्धु सखा सहायक रक्षक पोषक दाता हो ।
चींटी से लेकर हाथी तक सब के सिरजनहार हो
श्रद्धा रूपी भेट हमारी......
ऋषि मुनि योगी जन सारे तुझ से ही वर पाते हैं।
क्या राजा क्या रंक तुम्हारे दर पे शीश झुकाते हैं।
परम दयालु परम कृपालु करूणा के भण्डार हो ।
श्रद्धा रूपी भेंट हमारी ......
तूफ़ानों से घिरे 'पथिक' तुम ही एक सहारा हो । डगमग डगमग नैय्या डोले तुम ही नाथ किनारा हो । तुम खेवट हो इस नैय्या के और तुम ही पतवार हो।
श्रद्धा रूपी भेट हमारी......
भजन नं ८३ तेरी अपार महिमा
तर्ज रहा गर्दिशों में हर दम मेरे... तेरी अपार महिमा कैसे बयान होवे । कुछ बोलने से पहले गूंगी ज़बान होवे ।
तेरी अपार महिमा. में कौन होगा,
भगवान तुम से बढ़ कर दुनियां अब तक नहीं मिला जो तेरे समान होवे ।
तेरी अपार महिमा......
तेरी महानता की सीढ़ी को छू न पाये, दुनियां में कोई चाहे कितना महान होवे ।
तेरी अपार महिमा.......
जिस आदमी के सर पर करुणा का हाथ रख दे, उसकी हर एक मुश्किल पल में आसान होवे तेरी अपार महिमा.......
किसकी मजाल कोई तेरे खिलाफ बोले,
सारे जहाँ में लागू तेरा विधान होवे । तेरी अपार महिमा..... आंखों से देखने की तू चीज़ ही नहीं है, अन्तःकरण में तेरा प्रत्यक्ष ज्ञान होवे । तेरी अपार महिमा... जीवन में लोग तुझको पहले नहीं बुलाते, तब 'पथिक' याद करते जब लब पे जान होवे। तेरी अपार महिमा.....
भजन नं - ८४
कर्त्तव्य
तर्ज़- वो दिल कहां से लाऊ तेरी याद जो भुला दे। कण कण में जो रमा है हर दिल में है समाया । उसकी उपासना ही कर्त्तव्य है बताया । कण कण में जो रमा है.......
दिल सोचता है खुद वह कितना महान होगा, इतना महान जिस ने संसार है बनाया । कण कण में जो रमा है.......
देखो ये तन के पुरज़े करते हैं काम कैसे, जोड़ों के बीच कोई कब्ज़ा नहीं लगाया ।
कण कण में जो रमा है.......
इक पल में रोशनी से सारा जहान चमका, सूरज का एक दीपक आकाश में जलाया । कण कण में जो रमा है.....
अब तक यह गोल धरती चक्कर लगा रही है, फिरकी बना के कैसी तरकीब से घुमाया। कण कण में जो रमा है...... कठपुतलियों का हम ने देखा अजब तमाशा, छुप कर किसी ने सब को संकेत से नचाया । कण कण में जो रमा है........
हर वक्त बन के साथी रहता है साथ सब के, नादान 'पथिक' उसको तू जानने न पाया । कण कण में जो रमा है.......
भजन नं ८५
विदेशी चक्कर तर्ज़-दिल के अरमां आंसुओं में बह गए। अपने आदर्शों का सूरज ढल गया । देश में चक्कर विदेशी चल गया ।
अपने आदर्शों का......
चले गए अंग्रेज़ भारत छोड़ कर, वृक्ष तो अंग्रेजियत का फल गया ।
अपने आदर्शों का..... नग्नता दुनियां में बढ़ती जा रही, इस कदर फ़ैशन घरों में पल गया ।
अपने आदर्शों का.....
ग़ैर की क्या बात करते हो यहां,
जब सगे भाई को भाई छल गया । अपने आदर्शों का..... बिजलियां ऐसी गिरी इस पेड़ पर,
सभ्यता का घोंसला ही जल गया ।
अपने आदर्शों का......
धर्म काग़ज का खिलौना बन गया, चन्द बून्दें गिर पड़ीं और गल गया ।
अपने आदर्शों का..... 'पथिक' भ्रष्टाचार फैला सब जगह, इन दिलों पर कौन कालिख मल गया।
अपने आदर्शों का.....
भजन नं - ८६
हे ज्ञानवान् भगवन्
तर्ज- ओ रात के मुसाफिर चन्दा ज़रा बता दे। हे ज्ञानवान् भगवन् हम को भी ज्ञान दे दो। करूणा के चार छींटे करूणा निधान दे दो।
हे ज्ञानवान् भगवन्....
सकें हम अपने जीवन की उलझनों को,
सुलझा
प्रज्ञा ऋतम्भरा सी बुद्धि का दान दे दो ।
हे ज्ञानवान् भगवन्...
अपनी मदद हमेशा खुद आप कर सकें हम,
इन बाजुओं में शक्ति हे शक्तिमान् दे दो ।
ज्ञानवान् भगवन्..
उपकार भावना से निर्भीक सत्य वाणी, मीठे ही शब्द बोलें ऐसी ज़बान दे दो । हे ज्ञानवान् भगवन्. दाता तुम्हारे घर में किस चीज़ की कमी है, चाहो तो निर्धनों को दौलत की खान दे दो। हे ज्ञानवान् भगवन्.....
तुम देवता हो सब की बिगड़ी बनाने वाले,
जीवन सफल बने जो थोड़ा सा ध्यान दे दो।
हे ज्ञानवान् भगवन्..
डर है 'पथिक' तुम्हारा रस्ता न भूल जाएं ।
भक्तों की मण्डली में हमको भी स्थान दे दो।
हे ज्ञानवान् भगवन्...
॥ मुक्तक |
जैसे कवि अपने मधुर छन्द पर निछावर है। जैसे प्रेमी चकोर चन्द पर निछावर है। भृग अरविन्द के मकरन्द पर निछावर है। वैसे दिल मेरा दयानन्द पर निछावर है।
भजन नं ८७
जीवन सफल बना ले
तर्ज-अल्ला ही अल्ला किया करो, दुःख न किसी को दिया करो। नाम प्रभु का लिया नहीं। धर्म का सौदा किया नहीं
ऐसा मानव दुनियां में जी करके भी जिया नहीं ।
ऐसा मानव दुनियां में
जो कुछ भी यह इस दुनियां में देता है दिखलाई ।
ईश्वर है कण कण में समाया वेद ने बात बताई ।
वेद का अमृत पिया नहीं। धर्म का सौदा किया नहीं ।
ऐसा मानव दुनियां में..
यह धन किस के पास रहा है किस के पास रहेगा । पानी का तो काम है बहना यह हर हाल बहेगा । धन निर्धन को दिया नहीं। धर्म का सौदा किया नहीं । ऐसा मानव दुनियां में.. लालच मत कर लोभ छोड़ दे लालच बुरी बला है तू कर ले सन्तोष इसी में जो तिल फूल मिला है ।
फटा हुआ दिल सिया नहीं। धर्म का सौदा किया नहीं। ऐसा मानव दुनियां में....
नफरत दिल से दूर हटा कर सब को गले लगा ले ।
त्याग भाव से जी कर अपना जीवन सफल बना ले ।
'पथिक' सुनेगा भी या नहीं। धर्म का सौदा किया नहीं ।
ऐसा मानव दुनियां में.
॥ मुक्तक ।।
वह आंख ही क्या जिन आँखों को असली नकली का ज्ञान नहीं । वह कान ही क्या जिन कानों को दुःखियों के रूदन का ध्यान नहीं ॥ वह हाथ ही क्या जिन हाथों ने किया शुभ कर्मों में दान नहीं। वह रसना क्या जिस रसना ने किया प्रभु गुणगान नहीं ॥
भजन नं ८८
मां की पुण्य स्मृति पर
तर्ज- यहाँ बदला बफ़ा का बेवफाई के सिवा क्या है। कहां हो मां तुम्हें तेरे दुलारे याद करते हैं । यह टुकड़े जिगर के आंखों के तारे याद करते हैं। जहां में छिन गया हम से तुम्हारे प्यार का दामन, से
तुम्हें मायूस हाथों के इशारे याद करते हैं । हमारे वास्ते तुम तो बनी थी कल्प की छाया, दिए दिन रात जो तुमने सहारे याद करते हैं । कहां बाहों का वह झूला कहां वह गोद मख़मल सी,
जहां बचपन के दिन हमने गुज़ारे याद करते हैं। हज़ारों कष्ट सह कर भी सुखी हमको किया तुम ने, पिघल जाता है दिल जब वे नज़ारे याद करते हैं । अनेकों बार मां तुमने जिन्हें आंचल से पोंछा है,
बरसते अब वही आंसू हमारे याद करते हैं। जहां भी तू छुपी है मां कहीं से भाग कर आजा, बड़ी हसरत से ये बच्चे तुम्हारे याद करते हैं। यहां हर चीज़ मिलती है मगर इक मां नहीं मिलती, बिछुड़ जाती है मां जिनकी वे सारे याद करते हैं।
उमर भर प्यास का आलम न देखा हो किनारों ने, नदी जब सूख जाए तो किनारे याद करते हैं । समझते हैं गया प्राणी कभी वापिस नहीं आता, 'पथिक' हम क्या करें ममता के मारे याद करते हैं।
॥ मुक्तक॥
शुभ कर्मों के यज्ञ पात्र में, जिसका भी धन पड़ जाता है। उसका नाम सभी के उर आसन पर मणिसम जड़ जाता है पूंजी मक्खीचूस दाब धरती में दुर्गति मत कर धन की जो न निकलता है सरवर से वह पानी तो सड़ जाता है
भजन नं ८९
सच्चा सुख मिलया है
मिलता है सच्चा सुख केवल,
भगवान् तुम्हारे चरणों में।
यह विनती है पल-पल छिन छिन,
रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ।। चाहे वैरी कुल संसार बने, चाहे जीवन मुझ पर भार बने।
चाहे मौत गले का हार बने रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ॥ १॥
चाहे संकट ने मुझे घेरा हो,
चाहे चारों ओर अन्धेरा हो । पर मनन डगमग मेरा हो,
रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ॥ २॥
चाहे काँटो पर चलना हो, चाहे अग्नि में भी जलना हो।
चाहे छोड़ के देश निकलना हो,
रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ॥ ३॥
जिहा पर तेरा नाम रहे,
तेरी याद सुबह और शाम रहे। बस काम यह आठों याम रहे,
रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ॥ ४॥
भजन - ९०
बीती रे उमरिया
बातों ही बातों में बीती रे उमरिया तुझे होश न आया, यूं ही वक्त गंवाया किया कभी न भजन ओ मेरे मन बाल अवस्था यूँ ही गंवाया, की बहुत नादानी होश रहा तुझे कुछ भी नहीं, आयी तुझ पे जवानी वृद्ध भयो जब सूझे कछू ना, यूँ ही गया यौवन बचपन ओ मेरे मन.....
मानव तन मुश्किल से मिला है सब ने यही बतलाया
पर तूने अनमोल खजाना, कौड़ी समझ लुटाया
जान बूझकर अपने हाथों, यूँ न गंवा तू अपना धन
ओ मेरे मन...... मानव तन है जिस ने दिया तुझे उसको काहे भुलाया घट घट में जो रमा हुआ है वो मन में न बसाया मन मन्दिर में उस प्रियतम को, बिठला कर मूँद नयन ओ मेरे मन.....
भजन - ९९
तेरा ही आसरा है !
सारे जहां के मालिक तेरा ही आसरा है राज़ी हैं हम उसी में जिसमें तेरी रज़ा है हम क्या बतायें तुझको, सब कुछ तुझे ख़बर है, हर हाल में हमारी तेरी तरफ़ नज़र है । किस्मत है वो हमारी, जो तेरा फ़ैसला है तेरा ही आसरा है। हाथों को हम दुआ की खातीर में लायें कैसे सजदे में तेरे आकर सिर को झुकायें कैसे ।
तेरा ही आसरा है।
मजबूरियां हमारी, सब तू ही जानता है तेरा ही आसरा है।
रो कर कटे या हंस कर कटती है ज़िन्दगानी तू ग़म दे या खुशी दे सब तेरी मेहरबानी तेरी खुशी समझकर, सब ग़म भुला दिया है तेरा ही आसरा है। दुनियां बना के मालिक जाने कहां छिपा है आता नहीं नजर तू बस एक यही गिला है। भेजा है इस जहां में जो तेरा शुक्रिया हैं। तेरा ही आसरा है।
भजन ९२
तेरे पूर्ण भण्डार
हम सब मिलके दाता आये तेरे दरबार। भर दे झोली सब की तेरे पूर्ण भण्डार ।। होवे जब सन्ध्याकाल निर्मल होके तत्काल अपना मस्तक झुका के, करके तेरा ख़याल तेरे दर पर आके बैठे सारा परिवार । लेके दिल में फ़रियाद करते हम तुमको याद जब हो मुश्किल की घड़ियां तुम से मांगे इमदाद से सब से बढ़के उंचा जग में तेरा आधार ॥ चाहे दिन हो विपरीत, होवे तुमसे प्रीत सच्ची श्रद्धा से गावें, तेरी भक्ति के गीत होवे सब का प्रभु जी, तेरे चरणों में प्यार |
तू है सब जग का वाली करता सब की रखवाली
हम हैं रंग रंग के पौधे, तुम हो सब के माली
'पथिक' बगीचा है यह तेरा सुन्दर संसार |
भजन - ९३ ओम नाम के हीरे
ओम नाम के हीरे मोती में बिखराऊँ गली-गली । ले लो रे कोई ओम का प्यारा, आवाज़ लगाऊँ गली-गली ॥ माया के दीवानो सुन लो, एक दिन ऐसा आएगा धन दौलत और रूप खजाना, धरा यहीं रह जाएगा। सुन्दर काया माटी होगी, चर्चा होगी गली-गली ॥ १॥ मित्र प्यारे सगे सम्बन्धी, इक दिन तुझे भुलायेंगे। कल जो कहते थे अपना-अपना, अग्नि में तुझे जलायेंगे। दो दिन का यह चमन खिला है, फिर मुरझाए कली कली ॥ २॥ क्यों करता है मेरी मेरी, तज दे इस अभिमान को । छोड़ जगत् के धन्धे, जप ले प्रभु के नाम को ॥ गया समय फिर हाथ न आए, तब पछताए घड़ी-घड़ी ॥ ३॥ जिसको अपना कह करके, मूरख तू इतराता है। छोड़ दे बन्दे विपद् में, कभी न कोई जाता है। दो दिन का यह रैन बसेरा, आख़िर होगी चला चली ॥ ४॥
भजन ९४
भजन कर ले
सुबह शाम भजन कर ले मुक्ति का यतन कर ले। छूट जाएगा जन्म-मरण प्रभु का सुमिरन कर ले | यह मानव का चोला, हर बार नहीं मिलता, जो गिर गया डाली से, वह फूल नहीं खिलता । मौका है ये जीवन का, गुलज़ार चमन कर ले ॥१॥ नर इन कानों से सुन, तू सन्तों की वाणी, मन को ठहरा करके बन जा आत्मज्ञानी । जिह्वा तो चले मुख में, अब ओम् जपन कर ले ||२|| इस मैली चादर में हैं दाग़ लगे कितने, पर ज्ञान के साबुन में झाग भरे इतने । धुल जाएगी सब स्याही, उजला तन मन कर ले ॥ ३ ॥
सुन वेदों में गुँज रहीं, मन्त्रों की मधुर ध्वनियां, बलिदान की लड़ियों में, तू गूंथ नयी कड़ियां । प्रभु के आगे अब तो नीची गर्दन कर ले ॥ ४॥
भजन - ९५
देना सहारा मेरे देवता मुझको देना सहारा। कहीं छूट जाए न दामन तुम्हारा । तेरे रास्ते से हटाती है दुनिया इशारों से मुझको बुलाती है दुनिया। न समझू मैं जग का ये झूठा इशारा। कहीं छूट जाए न...... तेरे रास्ते से हटाए न कोई। लगन का ये दीपक बुझाए न कोई। तुम्हीं मेरी नैया तुम्हीं हो किनारा । कहीं छूट जाए न...... तेरे प्रेम के गीत गाता रहूँ मैं। तेरा नाम है मुझको प्राणों से प्यारा। कहीं छूट जाए न......
सुबह शाम तुम को ध्याता रहूं मैं।
भजन - ९६ दाता तेरे सुमिरन का
दाता तेरे सुमिरन का वरदान जो मिल जाये। मुरझाई कली दिल की एक आन में खिल जाये ॥ सुनते हैं तेरी रहमत दिन रात बरसती है। इक बूंद जो मिल जाये, तकदीर बदल जाये ॥
ये मन बड़ा चंचल है चिन्तन में नहीं लगता।
जितना इसे समझाऊं, उतना ही मचल जाए । हे नाथ मेरे दिल की बस इतनी तमन्ना है। पापों से बचा लेना, पांव न फिसल जाए ॥
देवत्व के फूलों से, दामन को मेरे भर दो। जीवन ये सुगन्धित हो, दुर्गन्ध निकल जाए। अए! मानव तू दिल से प्रभु नाम का सुमिरन कर दोषों भरे जीवन का काँटा ही बदल जाए।
भजन ९७
तर्ज : ऐ ऋषि याद आये जमाना..... ऐ ऋषि याद आये जमाना तेरा, सारे जग ने है माना फसाना तेरा ॥ अंधियारी रातमें कोई न था साथ में, ईश्वर था रक्षक और वेद थे हाथ में, हो-हो ऐसे समय में आना तेरा, ऐ ऋषि याद.....॥ १॥ हवा प्रतिकूल थी, नहीं अनुकूल थी, समझा न जगने तुझको बड़ी भारी भूल की हो-हो छोड़ा ना जालिमों ने सताना तेरा।
ऐ ऋषि याद..... ॥ २॥ लिये वेद हाथ में, काशी हरिद्वार में फेंकना भी चाहा तुझको गंगाजी की धार में..... हो-हो काम क्या प्रभु का बचाना तेरा रहे ऋषि याद ॥३॥ चला छोड़ बस्ती को, तजा बूत परस्तीको ठुकराया उदयपुर में लाखों की हस्ती को
दिल था प्रभु का दिवाना तेरा ऐ ऋषि याद... ॥४॥ कार्तिक महिना था, अभी और जीना था दिया जहर ‘कर्मठ' जगन्नाथ ने दुर्भाग्य था......हो-हो याद आये जहर पीकर मुस्कुराना तेरा ऐ ऋषि याद आये जमाना तेरा ....॥५॥
देवत्व के फूलों से, दामन को मेरे भर दो। जीवन ये सुगन्धित हो, दुर्गन्ध निकल जाए। अए! मानव तू दिल से प्रभु नाम का सुमिरन कर दोषों भरे जीवन का काँटा ही बदल जाए।
भजन - ९८
देश को स्वामी दयानंद मिल गये.
तर्ज : दिल के अरमां आसुओ में बह गये
देश को स्वामी दयानंद मिल गये। फुल वैदिक वाटिका के खिल गए ।
चल पड़े सुख सम्पदा को छोड़ के । सत्य वक्ताओं में हो शामिल हो गये ॥ १॥ • तर्क की तलवार जब ली हाथ में।
मिथ्या मत-पर्थों के शासन हिल गये ॥ २॥ जहर दे देकर किया स्वागत तेरा।
जीत करके हर किसी का दिल गये ॥ ३॥
विष पिया अमृत पिलाया देश को। प्यारे ऋषिवर पारकर मंजिल गये ॥ ४॥ श्रद्धानंद निर्भीक त्यागी हंसराज । देश पर मिटने को दे बिस्मिल गये ॥ ५॥
कामी, क्रोधी, लालची इन से भक्ति न होय । भक्ति करे कोई सूरमा जाति वरण कुल खोय ॥ चिन्ता ज्वाल शरीर वन, दावा लगि लगि जाय। प्रकट धुआं नहि संचरे, उर अन्तर धुंधुआय ।।
भजन ९९
तर्ज- शुभ-अशुभ कर्मों का फल...... शुभ-अशुभ कर्मों का फल निश्चय मिलना है कल। नहीं होगी फेर बदल प्रभु इन्साफ करेंगे, नहीं माफ करेंगे। जैसे सूरज छिपता है और निकलता है। इस तरह सृष्टि का क्रम यह चलता है। वो जान लेंगे जो प्रभु का जाप करेंगे। नहीं माफ करेंगे, शुभ-अशुभ कर्म का फल ॥ १॥ सिरपर जो नित नयी मुसीबत आती है,
किये हुये कर्मों की याद दिलाती है।
भरने पड़ेंगे उन जो माफ करेगें
शुभ-अशुभ कर्मों का ॥ २॥
क्या कुछ करने आये थे क्या कर बैठे, बाँध के गठरी पाप की सर जो घर बैठे।
रो रोकर आयु भर पश्चाताप करेंगे। नहीं माफ करेंगे शुभ-अशुभ कर्मों का. ..॥ ३॥ नहीं सिफारीश वहाँ किसी की चलती है। कहते जो चलती है, उनकी गलती है। 'बेमोल' अपना काम आप करेंगे नहीं माफ करेंगे।
शुभ-अशुभ कर्मों का ॥४॥
भजन १०० प्रभु भक्ति में..........
तर्ज: जरा सामने तो आओ प्रभु भक्ति में मन को लगाइये, वह सबका ही पालन हार है। दुख दूर करेगा परमात्मा, सर्व सुखों का वह भण्डार है। खाली उसके द्वार से आये, ऐसा कभी ना हो सकता। परम पिता को भूल के प्राणी, सुख से कभी ना सो सकता सारी सृष्टि का वह आधार है, उसकी महिमा का पाया न पार है। दुख दूर करेगा परमात्मा, सर्व सुखों का वह भण्डार है ॥ १॥ भाई बन्धु माल खजाना, साथ तेरे ना जायेगा, धर्म ही है इक अन्त का साथी काम तेरे जो आयेगा। शुभ कर्मों से होता बेड़ा पार है। नाव पापी की डूबे मझधार है। दुख दूर करेगा परमात्मा सर्व सुखों का वह भण्डार है ॥ २॥ विषयों में फँस करके बंदे, जीवन को बरबाद न कर; उत्त नर तन चोला उत्तम है यह, पाप न कर, अपराध न कर। नन्द लाल प्रभु निराकार है, दुख दूर करेगा परमात्मा सर्व सुखों का वह भण्डार है॥३॥
भजन - १०१
तर्ज: यह मानुष जन्म....
यह मानुष जन्म अमोल रे, इसे माटी में न रोल रे, अभी तो मिला है फिर न मिलेगा, कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं
संत्संग में तू जाया कर, गीत प्रभु के गाया कर। शाम सबेरे बैठ के बन्दे, प्रभु में ध्यान लगाया कर। इसमें क्या लगेगा मोल रे, इसे माटी में न रोल रे । अभी तो मिला है फिर न मिलेगा, कभी नहीं, कभी नहीं..॥ १॥
तू बुलबूला है, पानी का, मत कर मान जवानी का। नेक कमाई करले बन्दे पता नहीं, जिन्दगानी का सबसे मीठा बोल रे, इसे माटी में न रोल रे । अभी तो मिला है, फिर न मिलेगा, कभी नहीं, कभी नहीं॥ २॥
मतलब का संसार है, ना इसका एतबार है। सम्भल-सम्भल कर पग धर बन्दे फूल नहीं अंगार है ! मन की आँखें खोल रे, इसे माटी में ना रोल रे । अभी तो मिला है, फिर न मिलेगा, कभी नहीं, कभी नहीं
भजन - १०२
जिन्दगी इक किराये.....
जिंदगी इक किराये का घर है, इक ना इक दिन बदलना पड़ेगा। मौत जब तुझको आवाज देगी,
घर से बाहर निकलना पड़ेगा ॥ १॥
शाम के बाद होगा सवेरा,
देखना हो, अगर दिन सुनहरा।
पाँव फूलों पे रखने से पहले,
तुझको काँटो पे चलना पड़ेगा। जिंदगी इक किराये का घर है ॥ २॥ है ढेर मिट्टी का हर आदमी है। मरने के बाद होना यही है। यहाँ जमीनों में समाधि बनेगी या चिताओं में जलना पड़ेगा जिंदगी इक किराये का घर है ॥ ३ ॥
ये जवानी है पल भर का सपना ढूँढ लो कोई मेहबूब तू अपना । ये जवानी अगर ढल गई तो उम्र भर
हाथ मलना पड़ेगा।
जिंदगी इक किराये ॥ ४॥
॥ वेद सुनो ।
भजन १०३
दौलत के दीवानों ...
दौलत के दीवानों उस दिन को पहचानो।
जिस दिन भरी दुनिया से खाली हाथ चलोगे ।
क्या लेकर साथ चलोगे ॥ टेक।।
हीरे, मोती, लाल रत्न, चाँदी व सोना भरा हुआ है।
घर का हर कोना-कोना, सब छोड़ के बक्सों में,
हीरे जवाहरात चलोगे ॥ १॥
उँचे-ऊँचे महल अटारी चौबारे। हो जायेंगे धूमिल भूमि पर सारे ।
सब धूल में अपनी मिला औकात चलोगे ॥ २॥ दया, धर्म, शुभ कर्म से निस दिन दूर रहे।
यज्ञ, हवन, तप, दान से भी मजबूर रहे ॥
फिर कौन सी संग लेकर के सौगात चलोगे ॥ ३॥
दो गज कपड़ा तन की लाज बचायेगा। बाकी सब 'बेमोल' यहीं रह जायेगा। बस चार के कन्धों पे तुम हे तात चलोगे ॥ ४॥ क्या लेकर साथ चलोगे......
है।
भजन १०४
जहाँ प्रेम और प्यार है.......
जहाँ प्रेम और प्यार है सुखी वही परिवार है। पति करे आदर पत्नी का पतिव्रता जहाँ नार है। सुखी वही परिवार है सुखी वही परिवार है।
१) प्रेम शमा परवाने में ज्यों चाँद चकोर में होता
फूलो और भँवरो की भाँति जो बीज प्यार के बोता है। सेवा तप और त्याग से ही होता मानव का उद्धार है।
सुखी वही परिवार है. २) जीवन उपयोगी साम्रगी कोठी विडीयो कार जहाँ ।
भाई-भाई और पिता-पुत्र में रहता हमेशा प्यार जहाँ। अन्न, दूध, घी, फल, फूलों से भरा जहाँ भंडार है। सुखी वही परिवार है.........
३) पाँच यज्ञ जिस घर में होवे ईश्वर की हो उपासना
विद्वानों का सम्मान होवे बच्चों की होवे साधना। वृद्धों और मेहमानों का होता जहाँ सत्कार है।
सुखी वही परिवार है.........
४) सास बहू को समझे पुत्री बहू सास को कहे माता। नन्द जेठानी देवरानी में बहनों जैसा हो नाता। सारे सबन्धी और पड़ोसियों में रहता है वो प्यार जहाँ सुखी वही परिवार है.
५) पति-पत्नी एक दुसरे को सुखी प्रसन्न बनाते रहे दोनों ही एक दूसरे को सुखी प्रसन्न बनाते रहे। आदर्श एक मार्ग भी एक दोनों का एक विचार हो। सुखी वही परिवार है..
६) पति-पत्नी में न हो द्वेष भरा और सास बहू में न झगड़ा हो।
वृद्धों का सम्मान होवे
भाई-भाई में न झगड़ा हो।
'सिंह' कवि कहते हैं इसको यही स्वर्ग का द्वार है सुखी वही परिवार है।
भजन १०५
माँ का ऋण कौन उतारे.....
माँ का ऋण कौन उतारे बड़ा प्यार करे माँ बच्चे पर अपने कितने उपकार करें माँ माँ जीवन देती माँ जीवन देती ॥ १॥ हर माँ अपने संकट पर किंचित ना घबराये कहती है मेरे लाल पर कोई आँच ना आये..... जाये चाहे प्राण मेरे यह पुकार करे माँ ॥ २॥ चुप करती रोते सुत को माँ आप हिल हिल कर ढल जाती सारी रात ही आँगन में चल चल कर पल-पल अपनी ममता को बलिहार करे माँ॥ ३॥ कोई भी पुत्र माता के नयन से ना ओझल हो करता जो सेवा मा की जीवन उसका धन्य है। अन्न धन हो घर में दुख से हर पार करे माँ ॥ ४॥ सौभाग्य जिनको प्राप्त माँ का आर्शिवाद है। 'बृजपाल' जो ऐसा नहीं तो क्या औलाद है बरबाद है वह घर जहाँ शोक अपार करे माँ ॥ ५ ॥
भजन २०६
महापुरूष जनम लेंगे
स्थायी महापुरूष जनम लेंगे सुना न जहाँ होगा। गुरूदेव दयानन्द सा दुनियाँ में कहाँ होगा ॥ टेक ॥
अन्तरा: आकाश के आंगन में जब तक ये सितारे हैं। इन चांद सितारों में जब तक ये नज़ारे हैं। तब तक ऐ ऋषि तेरा अफसा नाँ बयां होगा ॥ १ ॥ महकेगा तेरा गुलशन जब दौरे खिंजा होगा ॥ २॥
भूचाल भी आयेंगे आंधी अंधियारे भी। तूफान भी उठेंगे पतझड़ भी बहारे भी।
धन, रूप, मालो, जर, का संसार पुजारी है। गुरूदेव दयानन्द ने इन्हें ठोकर मारी है।
इस तरह जमाने से कोई न गया होगा ॥ ३ ॥
बेदर्द जमाने ने क्या-क्या न सितम ढाए । एहसान दयानन्द के जाये नहीं गिनवाए। 'बेमोल' ऋषि तेरा नहीं कर्ज अदा होगा ॥ ४॥
भजन - १०७
जग में वेदों की जब तक
स्थायी जग में वेदों की जब तक निशानी रहे।
महर्षि की अमर ये कहानी रहे-कहानी रहे ।। प्यारा, ऋषिवर प्यारा, प्यारा ऋषिवर प्यारा ॥ टेक॥
अन्तरा: होऽऽ ऋण इतने हैं ऊपर हमारे।
आसमां में नहीं हैं सितारे ॥ जन्म सौ बार हो ऋण से न पार हो - २॥
याद उनकी सदा मेहरबानी रहे - २ ॥ १॥ प्यारा ऋषिवर.....
होऽऽ रात को भी न निद्रा में सोया।
दीन दुःखियों के दुःख में था रोया।
थी ऋषि की पुकार मेट दो अन्धकार ।
होऽऽ सत्य असत्य को तराजू पे तोला।
लुप्त था वेद का भेद खोला।
दे गया ग्रन्थ खास हमें सत्यार्थ प्रकाश।
जग में कुछ दिन जो मेरी, जिन्दगानी रहे - २॥ २॥ प्यारा ऋषिवर...... मेरे पीछे न कोई परेशानी रहे - २॥ ३ ॥ प्यारा ऋषिवर...... गंगा यमुना में जब तक, ये पानी रहे-२ ॥ ४ ॥ प्यारा ऋषिवर.......
होऽऽ छिन ली क्यों दीवाली ने ज्योति । लाख मोती नहीं ऐसा मोती।
कर गया है जो काम रहे बृज पालना।
भजन - १०८
मन का दीया
तर्ज़- या खुदा सोई किस्मत जगा दे।
जिन्दगी का सफ़र करने वाले।
अपने मन का दीया तो जला ले।
वक्त की धार यह कह रही है। कष्ट क्यों आत्मा सह रही है।
देख ऐसी जगह तू खड़ा है।
ज्ञान गंगा जहां बह रही है। बढ़ के गंगा में डुबकी लगाले। अपने मन का दीया ॥ १ ॥
रात लम्बी है गहरा अंधेरा। कौन जाने कहां हो बसेरा ।
तू है अनजान मन्ज़िल का राही। चलते रहना ही है काम तेरा।
रौशनी से डगर जगमगा ले। अपने मन का दीया.....॥ २ ॥
सूनी सूनी यह मन्ज़िल की राहें।
चूमना तेरे कदमों को चाहें।
गहन वन में कहीं खो न जाना। भटक जाएं न तेरी निगाहें
हर कदम सोच कर तू उठा ले। अपने मन का दीया ॥ ३ ॥ बस तुझे है अकेले ही चलना।
गिर के गिरना नहीं बात कुछ भी।
बहुत मुमकिन है गिरना फिसलना। हैं बड़ी बात गिर के सम्भलना। यह 'पथिक' बात दिल में बसा ले। अपने मन का दीया..... ॥४॥
भजन १०९
ऐसी करनी कर चलो, हम हाँसे जग रोय। जगत् में उनकी मिटी है चिन्ता, जो तेरे चरणों में आगये हैं। वही हमेशा हरे-भरे हैं, जो तेरे चरणों में आ गये हैं ॥ न पाया तुझको वजीर बनकर, न पाया तुझको फकीर बनकर, उसी को दर्शन हुए हैं तेरे, जो तेरे चरणों में आ गये हैं । न पाया तुझको किसी ने बल से, न पाया तुझको किसी ने, छल, से वही परम पद को पा गये हैं, जो तेरे चरणों में आ गये हैं | किसी ने जग में करी भलाई, किसी ने जग में करी बुराई । वही सुमारग पर चल पड़े हैं, जो तेरे चरणों आ गये हैं ।
भजन ११०
हर एक पत्ता और डाली २ सभी में तुम हो-२ तुम्हारी सत्ता से है क्या खाली, सभी में तुम हो, सभी में तुमहो ॥ तुम्हारा यश कोकिला है गाती, कली भी पुष्पों को है सुनाती, जहाँ कहीं शोभा देखी भाली, सभी में तुम हो, सभी में तुम अँधेरी रातों में नभ के तारे, मानों हैं विद्युत प्रदीप सारे, जगर-मगर हो रही दिवाली, सभी में तुम हो, सभी में तुम हो । महा मनोहारी मेघमाला में दामिनी का विमल उजाला, दिखा रहा है छटा निराली, सभी में तुम हो, सभी में तुम हो ॥ नमामि भक्तिों के कष्टहारी, शरण में हम सब प्रभो तुम्हारी, दो भक्ति भवसिन्धु तरने हारी, सभी में तुम हो सभी में तुम हो
भजन १११
ईश्वर तुम्हीं दया करो, तुम बिन हमारा कौन है ? दुर्बलता दीनता हरो, तुम बिन हमारा कौन है? जग को बनाने वाला तू, दुःख को मिटाने वाला तू । बिगड़ी बनाने वाला तू, तुम बिन हमारा कौन है ? माता तुही, तुही पिता, बन्धु तुही, तू ही सखा । केवल तुम्हारा आसरा, तुम बिन हमारा कौन है? तेरा भजन, तेरा मनन, तेरी ही धुन लगन तेरी शरण में आये हम तुम बिन हमारा कौन है?
भजन १९२
सारे नामों में है ओम् नाम प्यारा। देने वाला है वो सबको सहारा।
यह सूरज चाँद सितारे,
उसकी ही तो रचना है सारे
उसका रंग नहीं रूप, वो तो भूपों का भूप फिर ताज तख्त से क्या लेना, हाँ क्या लेना ॥ १॥
हमें और जगत् से क्या लेना-क्या लेना ॥ किसी और भगत से क्या लेना हाँ क्या लेना ॥ २॥
वो तो सतूचित और आनन्द है।
जीव कर्मों के बन्धन में बन्ध है।
लेकर उसका ही सहारा जीव पाते हैं किनारा
चाहे दुःख में हो चाहे सुख में
प्रभु का नाम हरदम हो मुख में
जग में वेदों का ही सार जीवन उसके अनुसार फिर बदकिस्मत से क्या लेना, हाँ क्या लेना ॥ ३॥
वो जीवों का मात-पिता वो ही बन्धु सखा देवता है। 'रामरख' सच्चा ओम् नाम भजले सुबह और शाम बेकार जगत से क्या लेना, हाँ क्या लेना ||४||
भजन ११३
काम नेकी के जो कर गये उनकी रोशन कहानी रहेगी।
पाप करने से जो डर गये उनकी रोशन कहानी रहेगी।
मोह संसार का छोड़कर, ईश भक्ति में लाई लगन। शोक सागर से जो तर गये, उनकी रोशन कहानी रहेगी।
काम नेकी के जो ॥ १ ॥
जिन्दगी के सुलभ पथ में भी, कुछ तो कांटे ही बोकर गये। के झोली फूलों से जो भर गये, उनकी रोशन कहानी रहेगी।
काम नेकी के जो...॥२॥
यूँ तो मरते हैं लाखों यहाँ, कायरों की तरह आदमी।
देश जाति पे जो मर गये, उनकी रोशन कहानी रहेगी।
काम नेकी के जो..॥३॥
अपने सुख दुःख में 'बेमोल', तू खूब हँसता है रोता भी है। दुःख (कष्ट) औरों के जो हर गये, उनकी रोशन कहानी रहेगी ॥
काम नेकी के जो करगये ॥ ४ ॥
भजन ११४
प्रभुवर इन प्राणों में, वरणीय तेज भर दो ।
ये ज्योति भरा जीवन, जगमग जगमग कर दो।
रमे रोम-रोम में तुम, प्रतिपालक हो मेरे । सुखशाक्ति भरे वैभव, वरदान है सब तेरे ।
शुचि पुण्य सुकर्मो से, बुद्धि को विमल कर दो
प्रभुवर........॥१॥
जग के उत्पादक तुम, प्रेरक व विकासक तुम ।
श्रुतिज्ञान प्रकाशक तुम, दुःख द्वन्द्व विनाशक तुम ।
गाऊ मैं गीत तेरे, मुझे ऐसा मधुर स्वर दो ||
प्रभुवर.. ..॥ २ ॥
हम ध्यान धरे तेरा, श्रुतिगान करें तेरा।
हम प्रेम का अमृत ही, नितपान करें तेरा। आनन्द सुधा से भर जीवन को अमर कर दो ।
प्रभुवर इन प्राणों में...
भजन - ११५
जीवन खत्म हुआ तो
जब शमां बुझ गई तो, महफिल में रंग आया ॥ १॥ गाड़ी निकल गई तो घर से चला मुसाफिर
जीवन खत्म हुआ तो, जीने का ढंग आया। फुर्सत के वक्त में ना, सिमरण का वक्त निकला। उस वक्त वक्त मांगा, जब वक्त तंग आया ॥ ४॥
मायूस हाथ मलता वापस बैरंग आया ॥ २ ॥ मन की मशीनरी ने, तब ठीक चलना सीखा। जब बूढ़े तन के हर इक, पुर्जे में जंग आया ॥ ३ ॥
आयु ने 'नत्थासिंह' जब हथियार फेंक डाले। यमराज फौज लेके करने को जंग आया ॥ ५ ॥
भजन - १९६
पी प्रभु ज्ञान का जल रे मना
पी प्रभु ज्ञान का जल रे मना । सत्संग वाली नगरी चल रे मना ॥
इस नगरी में प्रेम की गंगा,
जो भी नहाये, वो हो जाये चंगा तन मन होवे, निर्मल रे मना ॥ सत्संग
वाली नगरी ॥१॥
सत्संग के है अजब नजारे, बहुत सुहाने बहुत ही प्यारे,
पा सुख-शान्ति का फल रे मना ॥ सत्संग वाली नगरी ॥२॥ सत्संग का ये असर हुआ है बाहर सब कुछ बदल गया है तू अन्दर से, बदल रे मना ॥ सत्संग वाली नगरी ॥३॥
सत्संग का तो फल है निराला मन मन्दिर में करके उजाला
कर जीवन को, सफल रे मना।। सत्संग वाली नगरी
चल रे 'पथिक' शुभ कर्म कमा ले इस अवसर का लाभ उठा ले
देर न कर इक पल रे मना ॥
॥ ४ ॥
सत्संग वाली नगरी चल रे मना ॥ ५ ॥
भजन - १९७
तेरा सहारा
एक तेरी दया का दान मिले, एक तेरा सहारा मिल जाये। भवसागर में बहती मेरी नैया को किनारा मिल जाये ॥
जीवन की टेढ़ी राहों में चलकर, तुझको न जान सका।
आशाओं की झोली भर जाये, इक तेरा द्वारा मिल जाये ॥ १ ॥
मैं दीन हूँ दीनदयाल है तू, अल्पज्ञ हूँ मैं सर्वज्ञ है तू!
इस दुर्लभ अवसर को पाकर, कोई उत्तम कर्म कमा न सका। अब दिल की तड़प ये कहती हैं, कहीं प्रीतम प्यारा मिल जाये ॥ ३ ॥
अज्ञान का पर्दा फट जाये, तेरा उजियारा मिल जाये ॥ २ ॥ मैं नर हूँ तुम नारायण हो इतना तो भेद जरूरी है।
अपने मुझको अपना न सके, औरों को उलाहना क्यों कर दूँ। तू सर्व, वरों का दाता है, वरदान तुम्हारा मिल जाये ॥ ४ ॥
यदि शरण तेरी मैं पा न सका, नर तन तो दुबारा मिल जाये ॥ ५ ॥
भजन - १९८
याद कर ले घड़ी दो घड़ी
उस प्रभु की है कृपा बड़ी, याद कर ले घड़ी दो घड़ी। जो आया है वो जायेगा, बन्द होगा न ये सिलसिला ॥ वेद की कहती एक-एक कड़ी ॥ १॥ याद करले .....
घण्टी बज जाये कब कूच की, मौत हर दम सिरहाने खड़ी ॥ किन्हीं शुभ कर्मों का फल है ये, तुझे मानव का चोला मिला।
इस जवानी पे इतरा न तू, बातों बातों में मुक जायेगी उभरा सीना सिकुड़ जायेगा और कमर तेरी झुक जायेगी।
टेक करके चलेगा छड़ी ॥ २॥ याद करले.. जो करना है ले आज कर, कुछ ख़बर प्यारे कल की नहीं। मानव चोले को कर ले सफल, ढील दे इसमें पल की नहीं। टूट श्वासों की जाये लड़ी ॥ ३॥ याद करले....
भौतिकवादी चकाचौंध में, भूल प्रभु को न मतिमन्द तू ।
सच्चिदानंद सुखकन्द की, आ शरण में, ले आनन्द तू ।
वीर 'कवि' भागे विपदा अड़ी ॥ ४॥ याद करले......
भजन १९९
ओम् जपो मेरे भाई, ओम् जपो मेरी बहिना
अन्त समय तक इस वाणी से, ओम् ओम् ही कहना ॥
ओम् जपन से मन के कल्मष धुल जाते हैं। ओम् जपन से सारे बन्धन खुल जाते हैं।
ओम् ही सबका मुकुट मणि है ओम् ही सबका गहना ॥ १ ॥
ओम् नाम का सुमिरण सुख पहुँचाता है। ओम् नाम का चिन्तन मन हर्षाता है।
अमृत के सागर में प्रेमी, मस्त मगन ही रहना ॥ २ ॥
कभी-कभी जीवन में सुख भी मिलता है। सुख छिन जाता है तो, दुःख भी मिलता है। ईश्वर का वरदान समझके खुशी खुशी सब सहना ॥ ३ ॥
ओम् की राह में जीवन अर्पण हो जाये। बिन सोचे सर्वस्व समर्पण हो जाये।
जिस रंग में परमेश्वर राखे, उसी रंग में रहना ॥ ४ ॥
ओम् जपो मेरे.... ॥
भजन - १२०
जीवन की रूलाती घड़ियों में मिलता है तुम्हारा प्यार मुझे। कुछ चाह न बाकी रहती है, प्रभु आके तेरे दरबार मुझे ॥
मेरे दिल के गगन पर आके कभी, जब गम की घटा छा जाती है। इक पल में कहीं से दया तेरी, तब बनके हवा आ जाती है। तुझे रक्षक सबका कहने में, फिर क्यों हो भला इन्कार मुझे ॥ १ ॥
प्रभु दर पे तेरे आने वाला, झोली अपनी भर लेता है। तेरे दर पे प्रभु मैं क्या माँगू, बिन माँगे तू सब कुछ देता है। जो तेरी इच्छा है दाता, हरगिज है वहीं स्वीकार मुझे ॥ २ ॥ रहे प्यार तुम्हारे चरणों में, चाहे जन्म मिले सौ बार मुझे ॥ ३ ॥
जब तक में प्रभु दुनियाँ में रहूँ, बस एक मेरा यह काम रहे। मेरे दिल में प्रभु तेरी याद रहे, होठों पे तुम्हारा नाम रहे।
भजन १२१
शरण में आए है हम तुम्हारी
दया करो हे दयालु भगवान
सम्भाली बिगड़ी दशा हमारी। दया करो.....॥
न हम में बल है, न हम में शक्ति न हम में साधन न हम में भक्ति
तुम्हारे दर के हम हैं भिखारी। दया करो हे.....॥ १ ॥
जो तुम हो स्वामी तो हम हैं सेवक,
तुम । हो पालक तो हम हैं बालक जो
जो तुम हो ठाकूर तो हम पुजारी ।। दया करो.....॥ २ ॥
बुरे जो हैं हम तो हैं तुम्हारे,
भले जो हैं हम तो हैं तुम्हारे
तुम्हारे होकर भी हैं दुःखारी । दया करो..... ॥ ३ ॥
प्रदान कर दो महान शक्ति
भरो हमेशा विज्ञान भक्ति
तभी कहावोगे पाप हारी ॥ दया करो....॥ ४ ॥
भजन १२२
तर्ज-अखियों के सरोखों से
संसार के वाली ने संसार रचाया है। संसार रचाया है कण-कण में समाया है।
गरदूँ पै सितारों में कैसी चमक निराली है।
महताब में ठंढक है और शम्स में लाली है।
कहीं श्याम घटाओं ने कैसा जल बरसाया है॥ १॥
पतझड़ में बहारों में फूलों में खारों में,
तेरा रूप झलकता है रंगीन नजारों में, भौरों की गुंजारों ने क्या गीत सुनाया है ॥ २॥
कहीं निर्मल धारा है, कहीं सागर खारा है।
कहीं गहरा पानी है, कहीं दूर किनारा है।
जगदीश तेरी महिमा कोई जान ना पाया है।॥ ३॥
कोई चार के कन्धों पर दुनियाँ से जाता है।
कोई ढोल बजाकर के बारात सजाता है।
'बेमोल ' ये सृष्टि का कैसा चक्र चलाया है ॥ ४॥
भजन - १२३
जिस जीवन में प्रभु भक्ति नहीं वह जीवन निष्फल जाता है। जब प्रेम न हो उस ईश्वर से वह मानुष पशु कहलाता है। नादान न बन अनजान न बन, कुछ होश में आ दाता बन जा ।
यह दुनियाँ सराय फानी है, क्यों इस में महल बनाता है। जिस जीवन में. कर नेक कर्म बस यह ही धर्म, तू सबका हो सबका बन जा जो सेवक बन दिखलाता है, वह परम धाम को पाता है। ॥ १ ॥
जिस जीवन में.
कुछ सोच न कर उठ देख उधर, जग सागर है तन नैय्या है। जो तैरता है सो डूबता है, जो डूबता है तर जाता है।
जिस जीवन में......॥ ३ ॥
७ कुछ ध्यान करो कुछ दान करो, कुछ काम करो इस जीवन में प्रभु भक्ति के प्रयत्न से ही यह जीवन सफल हो जाता है।
जिस जीवन में.......
भजन १२४
छोड़ कर जग का पसारा दो घड़ी
याद कर जगदीश प्यारा दो घड़ी।
जग समुन्दर में थके जब तैर कर
दम बदम हम दम की रखना जुस्तजू । वक्त मत खोना अकारथ दो घड़ी ॥ १ ॥ ले लिया कर तू सहारा दो घड़ी ॥ २ ॥ सच्चे दिल से जो पुकारा दो घड़ी ॥ ३ ॥ कौड़ी बदले तोड़ दी मोती लड़ी ॥ ४ ॥
दो घड़ी में पापी मन धुल जायेगा।
रात दिन खोया है यूँ ही वक्त को।
दो घड़ी गर नाम तूने ले लिया। हो गई तेरी सफल जीवन घड़ी ॥ ५ ॥
भजन १२५
ये भावना बना ले, मत कर बुरा किसी का उपवन को जगमगा ले, करके भला सभी का ॥ आया जो काम जग के जीवन सफल उसी का ॥ १॥
परहित के हेतु जिसने जीवन किया समर्पित धन धाम सब लुटाया, अपना स्वदेश के हित
ये भावना बना ले |
कर्तव्यशीलता के हृदय में भाव भर ले
कल पर न टाल जो कुछ करना है आज कर ले बज जाये कब नगाड़ा तेरा चला चली का ॥ २॥
ये भावना बना ले |
डर कर किसी के डर से किंचित न डगमगाना निश्चित डगर पर अपनी मंजिल पर चलते जाना मन में कभी न लाना, एहसास बेबसी का ॥ ३ ॥
ये भावना बना ले
दुर्दैव दुर्दिनों का हुआ दौरा दूर तेरा तेरे सुखों का सूरज चमका हुआ सवेरा,
भैया समय मिला अब, तुझको हंसी खुशी का ॥ ४ ॥
ये भावना बना ले।
भजन १२६
सृष्टि रचाने वाले, दुःख से बचाने वाले दीनों को दो सहारा, मालिक है तू हमारा ॥ तेरी ही ज्योति से चमके, नभ में चाँद सितारे नील गगन में घन गरजन में, देखे बड़े नजारे, बिगड़ी बनाने वाले, दुःख से बचाने वाले ॥ दीनों को.. ..॥ १ ॥
चारों ओर जो दिख रही है, यह तेरी फूलवाड़ी, रंग बिरंगे फूल खिले हैं खुशबु न्यारी न्यारी, कलियाँ खिलाने वाले, दु:ख से बचाने वाले दीनों को सहारा ... ॥ २ ॥ धरती का मुख भरा फूलों से, और सागर में मोती नील गगन में पानी बरसे, देख हैरानी होती अमृत पिलाने वाले, दुःख से बचाने वाले दीनों को...॥ ३ ॥
निराकार निर्लेप नियन्ता, तू घट घट का वासी 'लक्ष्मणसिंह बेमोल' कहे तू, सुखदाता सुखराशी बिछुड़े मिलाने वाले, दुःख से बचाने वाले ॥
दीनों को दो ॥ ४ ॥
भजन - १२७ भगवान तेरी महिमा क्या खूब निराली इक घर में अन्धेरा है, इक घर में दिवाली है ॥ क्या अज़ब तमाशा है, क्या खेल रचाया है, ये भेद तेरा दाता, कोई जान न पाया है, अरबों का वाली है, फिर गोद से खाली है। भगवान तेरी.......॥ १॥
कोई कितना सुन्दर है, फूलों से सजाया है, कवि भी कविता करके गुण रूप को गाया है, कुरूप कोई इतना, जैसे रजनी काली है ॥ भगवान तेरी...॥ २ ॥ तकदीर की हलचल है, या कर्म का पाशा है, दर दर का भिखारी है, एक हाथ में काँसा है, भर पेट नहीं मिलता भोजन का सवाली है।
भगवान तेरी.... संसार पहेली है, उलझन ही उलझन है, 'बेमोल' ये रिस्तों का यह कैसा बंधन है, कुछ दिन के लिए हमने, यह दुनियां बसाली है ॥ भगवान तेरी...॥४॥
भजन - १२८
आया शरण ठोकरें जग की खाके।
हटूंगा प्रभु तेरी, दया दृष्टि पाके ॥
पहले मगन हो, सुखी नींद सोया, सब कुछ पाने का सपना संजोया, मिला तो वही जो लाया लिखाके ॥ १॥
मान ये काया का, है बस छलाबा। रावण सा मानी भी, बचने न पाया, रखूँगा कहाँ तक मैं खुद को बचाके ॥ २ कर्मों की लीला, बड़ी है निराली, हरिश्चंद्र मरघट की करे रखवाली, समझ में ये आया, सब कुछ लुटाके ॥ ३ ॥ न है चाह कोई, न है कोई इच्छा, अपनी दया की मुझे दे दो भिक्षा,
जिसे सबने छोड़ा उसे तू ही राखे ॥
आया शरण ॥ ४ ॥
भजन - १२९
बात समझ में आयी अब हमारी, झूठी है सारी दुनियाँ दारी। और न लो अब परीक्षा हमारी, आये शरण अब प्रभु हम तुम्हारी ॥
मैं मेरा का भ्रम अब है टूटा, समय ने किया सब रिश्ता ये झूठा
मोह माया में मति गई मारी ॥ १ ॥ जिनपे भरोसा करके समझा था अपना, टूटा भ्रम सारा मिथ्या था सपना, मतलब की ही सबकी यारी ॥ २ ॥ चंचल मन ने बहुत नचाया। धन ही कमाने का लक्ष्य बनाया चैन गया और नींद बिचारी ॥ ३ ॥ अन्तिम आशा भरोसा तिहारा, थक गया हूँ चहूँ ओर से हारा। दृष्टि दया की करो मंगलकारी ॥ ४ ॥
भजन १३०
तर्ज काहे मनवा दुःख की
बावरे मनवा क्यों न प्रभु की याद आती है। प्रभु तेरा ही साथी है, ममता की लड़ी तो टूट जाती है।
भाई बन्धु कुटुम्ब के झमेले, चन्द दिन के समझ ले ये मेले। अकेले ही छोड़े सूरत जिनकी मन भाती है ॥ १॥
आते नहीं उनकी यादें तड़पाती है ॥ २॥
जानेवाले जो हैं जग से जाते, फिर यह लौट करके नहीं आते। राजा हो चाहे रानी, सभी को मौत आती है ॥ ३ ॥ आनेवाला समय न टलेगा धर्म ही साथ तेरे चलेगा। जलेगा 'कर्मठ' दीप जब तक तेल और बाती है ॥ ४॥
कर्म कुछ नेकियों के कमा जा, जाने पर याद जो तेरी आजा
भजन १३१
जीवन की जब उजड़ जाय बहार
हाथ मल मल तू पछताएगा।
आज की बात कल पे ना टाल
वक्त गुजरा ना हाथ आएगा।
जो कुछ करना है कर ले अभी,
कल तक तू रहे ना रहे।
क्या पता कल तेरी ये जुवां
बंद हो और तू कुछ ना कहे।
टूटते ही ये स्वासों का तार, क्या सितारे ये बज पाएगा ॥ १ ॥
आती हर रात के पीछे कल कल के जाते ही फिर आती कल।
आज तक किसने देखी है कल
कल के आते ही तू देगा चल, चार कंधों पे होकर सवार ये मकां खाली कर जायेगा.
राज्याभिषेक कल, राम का होने वाला था हो न सका, कल के आते ही वन चल दिये, नृप रातभर में सो न सका। विनती कैकेयी से की बार-बार सुत का गम मुझको तड़पाएगा। जिन्दगी आज कल मौत की घण्टी बजने लगी हो तो क्या जाने ये हम निकल जा कहाँ धरती या गहरे सागर में जा जानता कल की वो सर्वाधार राज 'कर्मठ' क्या समझाएगा।
भजन १३२
हर दम है तैयार तू पाप कमाने के लिए। कुछ तो समय निकाल प्रभु गुण गाने के लिए। गर्भवास में वचन दिया था नाम जपूँगा मैं तेरा। इस झूठी दुनियाँ में आकर नाम भूल गया मैं तेरा। ऋषि, मुनि यहाँ आते हैं समझाने के लिए ।
तो समय.....।। १ ।। कुछ
जब तक तेल दीप में बाती जगमग जगमग हो रहा, जल गया तेल निपट गई बाती, ले चल ले चल हो रहा, चार जने फिर आते हैं ले जाने के लिए
कुछ तो समय निकाल....॥२॥ हाड़ जले जैसे सूखी लकड़ी केश जले जैसे घास, रे। कंचन जैसी काया जल गई कोई न आया पास रे।
अपने पराये रोते हैं दिखलाने के लिए
कुछ तो समय निकाल॥३॥
ऐसी हालत इस जीवन की चेत जरा तू चेत रे,
क्षणभंगुर जीवन में तू जपले प्रभु के नाम को, ‘प्रेमी' कहे ये जीवन है प्रभु पाने के लिए।
कुछ तो समय निकाल ॥ ४ ॥
भजन नं १३३
तर्ज- कौन दिशा में लेके चला रे......
ओम् के भजन बिना बीती रे उमरिया
तू सोच जरा क्या जग में धरा
उसी का ध्यान धरले, ध्यान धरले.... ॥ मोह माया को छोड़के अब तो, कर ले उसी का संग रे जीवन की तोरी यही सच्ची रे उमरियातू सोच जरा ॥ १॥ किसको सुनाता दुखड़े अपने, कौन सुने यहाँ तेरी
साथी बन जा उस प्रभु का, जीने का यही ढंग रे, इस पथ से तू बहक न जाना वरना होगा तंग रे,
स्वार्थ में सब डूबे यहाँ पर, करते मेरा मेरी
चाहे सुख तो ओम् भजन कर, ना करना अब देरी ख़ाक में मिलेगी वरना तेरी रे उमरियातू सोच जरा .....॥ २॥ जपता जो भी प्यारे प्रभु को, जिसका सद्व्यवहार है, उसका 'अनल' भवसागर से समझो बेड़ा पार है जो भी इन्सान भूलता उसको, जान लो वो मझधार है पार होने की वही एक है नवरीया......तू सोच जरा ॥ ३॥
भजन नं १३४
तर्ज-जिन्दगी की ना टूटे......
स्वांस अनमोल तेरी बड़ी
ओम् भजले घड़ी दो घड़ी ॥
ऐसा जीवन भी जीवन है क्या, जिसमें ईश्वर की भक्ति नहीं, कभी शुभ कर्म करने की भी, भावना उनमें जगती नहीं होऽऽऽ भावना उनमें जगती नहीं
पशु बनके फिर तू खाये छड़ी.. ओम् भजले.....॥१॥ वही सबसे सहारा बड़ा, और कोई सहारा नहीं, पिता-माता सखा है वही, और कोई हमारा नहीं होऽऽऽ और कोई हमारा नहीं स्वार्थी है ये दुनियाँ बड़ी. .ओम् भजले.....॥२॥
कौन जग में रहा है अमर, मुझको यह तो जरा दे बता कल तक हम रहेन यहाँ, यह किसको भला है पता होऽऽऽ यह किसको भला है पता
मीत तेरे
सिरहाने खड़ी. ..ओम् भजले ॥३॥ बुरे कर्मों का फल है बुरा भले कर्मों का फल है भला
अपने महल के खातिर किसी की झोपड़ी ना किसी की जला होऽऽऽ झोपड़ी ना किसी की जला ध्यान से सुन 'अनल' की कड़ी.
. ओम् भजले.....॥
भजन नं १३५
तर्ज ओ साथी रे.....
ओ बन्धु रे चार दिनों की जिन्दगानी
जीवन है एक कहानी।
जीवन है दो पल का पता नहीं कल का, ये सराया है फानी। मान करे तू जिस काया का, वह तो एक दिन मिट जायेगी, जानेवाली है वस्तु वह पास तेरे न टिक पायेगी त्याग है मन से तू इतना समझ ले तू, ये है बुलबुला पानी ॥ १॥
चार दिनों की जिन्दगानी ॥
चार दिनों की जिन्दगानी ॥
यौवन रूत के ढ़ल जाने पर तुम पे बुढ़ापा आ जायेगा।
मुख पे झुड़ियाँ पड़ जायेगी, चेहरा ये कुम्हला जायेगा उस वक्त सोचेगा, अपने को कोसेगा, लौटेगी न ये जवानी ॥ २॥ चार दिनों की जिन्दगानी ॥
दौलत है एक चीज अनोखी, एक जगह न इसका ठिकाना बातें तो की है हमने सच्ची, समझे न कोई दिल दिवाना माया आगे आगे, बन्दा पीछे भागे, माया की माया निराली ॥ ३॥ चार दिनों की जिन्दगानी ॥
भजन नं १३६
भगवान तुम्हारे दर पे भक्त आन खड़े हैं। संसार के बन्धन से परेशान खड़े हैं । ओ मालिक मेरेऽऽऽ ओ मालिक मेरे || संसार से निराले कलाकार तुम्हीं हो सब जीव जन्तुओं के सृजन हार तुम्हीं तुझ परम प्रभु का मन में लिये ध्यान खड़े हैं।
संसार के बन्धन से ॥१॥ तुम वेदज्ञान दाता पिताओं के पिता हो वह राज कौन सा है जो कि आपसे छिपा हम तो हैं अनाड़ी बालक बिना ज्ञान खड़े हैं। संसार के बन्धन से.
सुनकर विनय हमारी तो स्वीकार करोगे.
मझधार में हैं नैय्या प्रभु पार करोगे
जब कदम-कदम पर आगे ये तूफान खड़े हैं।
संसार के बन्धन से ॥३॥ दुनियाँ में आप जैसा कहीं और नहीं इस ठौर के बराबर कोई और नहीं अपनी तो 'पथिक' मंजिल है पहचान खड़े हैं। संसार के बन्धन से परेशान॥
भजन नं १३७
प्रभु जी तेरी लीला है अपरम्पार २ सबके मालिक सबके पालक वो जग के करतार
प्रभु जी तेरी ......
जो अविनाशी घट-घट वासी भेद न तेरा पाया, सबकी नजरों में रहकर भी नजर किसी को न आया, पर जो तेरा हो जाये, तुझे हर रंग में वह पाये, करे तेरा सदा दीदार, प्रभु जी तेरी.... ॥१॥
बिन मांगे दे मुफ्त सभी को, हवा रोशनी पानी, दान करे और जत लाये न, गजब का तू है दानी, तू सबको देवे दाता, तेरा दिया हुआ हर कोई खाता,
है तेरे भरे भण्डार। प्रभुजी.....॥२॥
दिन को दुनियाँ काम करे और रात को करे आराम, रात न होती तो सबकी हो जाती बोलो ओम, भ्याखूब नियम है तेरा, जाये रात और आये सबेरा, हर रोज समय अनुसार
प्रभु जी तेरी.. ॥३॥
वो सेवक के मालिक तेरी हरेक बात निराली, हम तो छुट्टियाँ करते हैं पर, तू न बैठा खाली, दिन रात और सांझ सबेरे, खुले रहते हैं दफ्तर तेरे, तू सबसे बड़ी सरकार प्रभु जी तेरी लीला.. ॥४॥
भजन नं १३८
तर्ज-गोरी है कलाईयां...॥ संसार में आके अरे ये नर तन पाके कोई किया है शुभ काम ना ॥
कोई शुभ कर्म पहले जन्म में कमाया है। मानव का चोला उसके बदले में पाया है। यूं ही उम्र गवां के, अरे ये नर तन पाके
लेता है फिर भी उसका नाम ना ॥ १॥ विधाता ने कैसे सारी सृष्टि को रचाया है। कैसी खूबियों से कायनात को सजाया है। अहसान भूलाके अरे ये नर तन पाके सिमरन किया है सुबह शाम ना ॥ २ ॥ मन में जो आये वो ही करे मन मानियां कभी ना विचारता है लाभ और हानियां ठोकरें दर-दर खाके अरे ये नर तन पाके सोचा कभी परिणाम ना ॥ ३ ॥
प्रभु के भजन बिना पार कैसे जायेगा, बीच मझधार में नाव को डुबायेगा अरे 'बेमोल' तू गाके अरे ये नरतन पाके पहुँचेगा कभी उसके धाम ना ॥ ४॥
भजन नं १३९
दो घड़ी भगवान को तू सिर झुका के देखले। दीन बन्धु की शरण इक बार आकर देख ले। गंगा यमुना तीर्थों पर जा रहा कभी आ रहा। मन के मन्दिर में भी एक दीपक जला के देख ले। आशीकाने फिल्मी नगमे लिखते रहा गाता रहा। सच्चे रहबर की ग़ज़ल कुछ गुनगुना के देख ले ॥ माँ की गोदी में रहे बच्चा सुरक्षित बैठकर । तू भी तो उस गोद में आसन लगा के देख ले ॥ कौन सी ऐसी है उल्झन जिसको तू सुलझा रहा। उलझनों से अपने दामन को बचाके देख ले। हो गया सो हो गया, आगे का अब तो ध्यान कर। कुछ मधुर 'बेमोल' नग में स्वयं गा के देखले ॥
भजन नं १४० -
ओम् नाम के हीरे मोती मैं बिरवराऊँ गली-गली। ले लो रे कोई ओम् का प्यारा आवाज लगाऊँ गलीगली ॥ माया के दीवानों सुन लो एक दिन ऐसा आयेगा। धन दौलत और माल खज़ाना धरा यहीं रह जाएगा। सुन्दर काया माटी होगी चर्चा होगी गली-गली। ले लो रे..........!!
क्यों करता है मेरा मेरी तज दे इस अभिमान को, छोड़ जगत के झूठे धन्धे जपले प्रभु के नाम को। गया समय कभी हाथ न आये, फिर पछतावे घड़ी घड़ी ॥
ले लो रे.
मित्र प्यारे सगे सम्बन्धी इक दिन तुझे भुलायेंगे। कल तक जो कहते थे अपना अग्नि में तुझे जलायेंगे । दो दिन का यह चमन खिला है, मुझयेगी कली-कली ॥
ले लो रे कोई........…..॥ जिसको तू अपना कह कहकर मूरख तू इतराता है। छोड़ दे बन्दे साथ विपद् में साथ नहीं कोई जाता है। दो दिन का यह रहन बसेरा आखिर होगी चला चली ॥ ले लो रे कोई॥
भजन नं १४१
जिस आदमी का सर झुके भगवान के आगे । सारी दुनियाँ झुकती है उस इन्सान के आगे ॥ खुले आकाश में उड़ती पतंगे हाथ में डोरी । मगर क्या डर उसे जिसकी प्रभु के हाथ में डोरी । ताकत भी फिकी पड़ती है उस बलवान के आगे ॥ जिस आदमी..... ॥
बड़े से भी बड़ा संकट उसे फिसला नहीं सकता मुसीबत के दिनों में वह कभी घबरा नहीं सकता । उसे ठहरा पाओगे हर तूफान के आगे जिस आदमी..... ॥
बसे वह देवता बनकर जमाने के खयालों में,
उसी के नाम की चर्चा अंधेरे में उजाले में ।
सूरज भी क्या चमकेगा उस इन्सान के आगे ॥
जिस आदमी.....॥ वह सारे इम्तिहानों में हमेशा पास होता है । 'पथिक' जीवन की राहों में कभी न उदास होता है । मंजिल भी आ जाती है, उस मेहमान के आगे ॥ जिस आदमी.....॥
भजन नं १४२ -
तर्ज गोरे-गोरे मुखड़े पर विश्व के कण-कण में है परमात्मा,
सारे जगत में है उसी की करिश्मा।
हाथों बिना पहाड़ बनायें, सुन्दर फूल खिलायें,
वर्षों से कल-कल छल-छल नदियाँ शोर मचाये,
कहीं उँचे टीले कहीं बर्फीले खाई है,
कैसी बारिकी से ये दुनियाँ सजाई है।
सुखा कहीं पल में जल बरसता कितना,
सीप सी चमकती आँखे बनाई कैसी ।
सूई धागा हाथ नहीं और लिया नहीं कैंची।
हरी भरी क्यारियों में शीतलता छाई है।
फूलों के सुगंन्धी में खुशियाँ लुटाई है।
खट्टे मीठे फलों में भी रस भरा कितना ।
देखा इस संसार में बना कोई वजीर है,
सड़कों पर लुटते देखा खाली पेट फकीर है।
फूलों के सेज पर चैन नहीं आता है,
कांटो पर सोता भी कोई मुस्कुराता है,
किसी को हंसाया रुलाया है कितना।
भजन नं १४३ -
सृष्टि के पहले अमर ओम् नाम था।
आज भी है और कल भी रहेगा ।। धृ ॥
सूरज की किरणों में उसी का तेज समाया है।
चाँद सितारों में उसी का शीतल छाया है। धरती की गोद में उसी का दुल्हार था ।
भवरों की तानों में मधुर संगीत उसी का है। फूलों के यौवन में रसीला गंध उसी का है।
आकाश जल थल का वही कलाकार था ।
ये सुख दुःख का ये लंबा खेल विधाता ने जो रचाया है। बंदे तेरी करणी का नक्शा सामने आया है।
तेरे पिछले कर्मों का उसी का हिसाब था। तु मत कर इतना गुमान एक दिन जान निकल जाएगी। तेरी सजी सजाई काया मिट्टी में मिल जाएगी। मुक्ति का एक रास्ता प्रभु का ही ध्यान था।
भजन नं १४४
तर्ज मेहबूब मेरे......
प्रभुदेव मेरे प्रभुदेव मेरे, जीवन सफर का तू हम सफर है,
तुझसे सुहानी अपनी डगर है। दिल तो प्यारा है, पर तू दिल से प्यारा है। मेरी दुनियाँ मेरी जन्नत मेरा सब कुछ तेरा दर है ॥ १॥ तेरे दम से चेहरों पर रोनक छाई है, तू है तो ये जिंदगी मुस्कुराई है। हमने जो कुछ भी है पाया, तेरी रहमत का असर है ॥२॥ हमने हाथ दिया जब से, तेरे हाथ में है, जीवन को जीने का आनंद तेरे हाथ में है।
हँसते कट जायेगा रास्ता यूं ही तेरा साथ अगर है ॥ ३ ॥ रहमत कर अब तेरा ये संग नहीं छूटे,
दाता अपनी प्यार की डोर नहीं टूटें।
बिन तेरे तो इस दुनियाँ में सिर्फ ठोकर ही ठोकर है ॥४॥
भजन नं - १४५
ये फूल और कलियाँ झरने झील व नदियाँ । प्रभु का पता दे रहे हैं सभी ॥ प्रभु को नमन कर....
पी पी बोले पपीहा बागों में, गाए अनमोल नगमें रागों में। मैना के दिल को गाए, व कोयल भी बार-बार गाए ॥१॥ तूफां आंधी और ये घनवृष्टि, प्यारी रचना उसी की है ये सृष्टि,
भवरों की गुंजार मधुर, झिंगुर भी करतें है घुर घुर ॥ २ ॥ सारे संसार का है वो वाली. कोई शय उसके बिन ना है खाली, पतझर में है बहारों में है, गुल गुलशन व खारों में ॥ ३ ॥ कहता है वो सचिन सारंग ना करना ध्यान तू अपना भंग ॥ ४ ॥
तेरे दिल में ही वो दाता आए नजर, क्यूं फिरता अरे तू इधर उधर
भजन नं १४६
सुख धाम सदा तेरा नाम सदा, कोई तुझसा और महान नहीं। कण-कण में बसा घट-घट में रमा तेरा अपना कोई मकान नहीं ॥ कोई दीन-दुखी जो पुकारे तुझे सुनता है प्रभु तू सदा उसकी। तुझे कहते हैं नाथ दयालु सभी कोई तुझसा दया निधान नहीं ॥ १ ॥ तूने यूँ तो रचाए जमीं आसमां पर्वत सागर बहती नदियाँ। पर ढूँढने तुझको जाएँ कहाँ, तेरा कोई पता व निशान नहीं ॥ २ ॥ हे जगत्पिता हे जगत् पति कोई जान सका न तुम्हारी गति । क्या योगी यति क्या साधु सति कोई दूजा तेरे समान नहीं ॥ ३ ॥ तेरा नाम जपूं प्रभु ये वर दो 'बेमोल' की अब झोली भर दो। करुना निधि अब करुना कर दो, कोई तुझसा करुणा निधान नहीं।
भजन नं १४७ तर्ज-बहुत प्यार करते....... | बहुत कीमती है ये मनुष्य जनम ईश्वर से मिलने का करो कुछ यतन ॥ कई जन्मो में शुभ कर्मों को कमाया, मानव का चोला उसके बदले में पाया, तब जा करके पाया हीरा जनम ॥
बचपन गया तेरा बच्चों के संग में, बड़ा जब हुआ तो रहा यौवन के घमण्ड में, बूढ़ा हुआ तो करना चाहता भजन ॥ बीता हुआ समय वापस न आता है, गया हुआ यौवन कभी लौट कर न आया है, जवानी में करलो तुम भले शुभ हवन ॥ परहित में त मन भानु लगाये चला जा। गीतों से शोभा जग की बनाये चला जा। जाना पड़ेगा तुझको अपना वतन ॥
भजन नं १४८
तर्ज-बहुत प्यार करते हैं.... ।
बैठ दो घड़ी कर प्रभु का भजन । बन्धनों से बच ले करके यतन ॥ रचा जिसने सुन्दर ये संसार सारा। जगत् में उसी का है सब पसारा। गीत गा उसी के तू हो कर मगन ॥ १ ॥
दया से है उसकी मनुष्य देह पाई, तेरे भोग की सारी चीजें बनाई, किया कितना उपकार जरा कर मनन ॥२॥ तृष्णा ना होगी कभी मन की पूरी करो लाख कोशिश रहती अधुरी सन्तोष सम ना कोई और धाम ॥ ३ ॥ अगर चाहता है तू उद्धार अपना बना ले प्रभु को ही आधार अपना, 'मधुर' जिंदगी में मिलेंगे सुमन ॥४॥
भजन नं १४९
ओ३म् कहने से तर जायेगा-२
तेरा जीवन सॅवर जायेगा-२ ओ३म् कहने से तर जायेगा......॥
बड़ी मुश्किल से नर तन मिला- २ पार भव से उतर जायेगा - २
ओ३म् कहने से तर जायेगा....॥
अपनी झोली तो फैला जरा-२ देने वाला है भर जायेगा- २
ओ३म् कहने से तर जायेगा.... ॥
सब कहेंगें कहानी तेरी २
काम अच्छा जो कर जायेगा-२
ओ३म् कहने से तर जायेगा.....
॥
भजन नं १५०
तर्ज-जनम-२ का साथ है हमारा..... ॥
मानव जनम मिला है हमें प्यारा प्यारा,
पाकर इस अनमोल रतन को कुछ भी हीं विचारा ॥
वैसे तो दुनियां में, है ये लाखों प्राणी,
सबसे न्यारी भाषा, सबसे प्यारी वाणी,
है वो वाणी धन्य प्रभु का, जिसने नाम पुकारा ॥ १ ॥ ईश्वर ने दिये हैं सुख साधन जीवन के, फिर भी हुए न पूरे सपने मन के, राग द्वेष को त्याग के अपना, जीवन नहीं सुधारा ॥२॥ जल-थल में अम्बर में, है तेरी प्रभुताई, है अफसोस कि तूने मन पर विजय न पाई। खाक 'निरंजन' जीना तेरा यूं ही समय गुजारा ॥ ३ ॥
भजन नं १५१
ये जीवन तुम्हारा तुम्ही को है अर्पण, लगा दो किनारे पे ओ मेरे भगवन् ॥ हो करुणा के सागर दया के हो दाता, तुम्ही जग के पालन तुम्हीं हो विधाता, ये सोया है मानव इसे तुम जगा दो ॥ १ ॥ मैं पथ से गिरुँ तो मुझे थाम लेना, दया करके सद्बुद्धि देते ही रहना, जो सच्चा है मार्ग उसे तुम दिखाओ ॥ २ ॥ तुम्हारे करों से है ये जीवन की नैया लगादो इसे पार मेरे खिवैया, कृपा डूबने से इसे तुम बचालो ॥ ३ ॥
भजन नं १५२
तुम हो सकल विधाता संसार के सहारे। जग के तुम्ही हो दाता माता पिता हमारे ॥ आत्म का ज्ञान दे दो हे ज्ञान के भण्डारी, मेधा अपार दे दो, सुन लो विनय हमारी, तुम हो दया के सागर, हम दास हैं तुम्हारे ॥ १ ॥ रोशन सभी हैं तुमसे ये चाँद और सितारे, जंगल पहाड़ नदियाँ फल फूल प्यारे प्यारे, दिल में बसे हमारे कुदरत के नजारे ॥ २ ॥ व्यापक सभी जगह हो पर्वत में और वन में, ढूढाँ तुझे जगत में आखिर मिले हो मन में, नश्तार तुझसे जीवन लाखों ने हैं संवारे ॥३॥
भजन नं १५३
जपाकर जपाकर सुबह और शाम
हरिनाम प्रभु नाम प्यारा ओम् नाम ॥ जिसने तुझे यह चोला दिया है, उसको ही तूने भुला क्यों दिया है, न जाने कब ढल जाय जीवन की शाम ॥ १ ॥ धन दौलत का गुमान न करना, गन्दी कमाई बद दुवाओं से डरना। आत्मा का प्यास बुझाले पी प्रभु जाम ॥ २ ॥
खेल खिलौनों में जीवन को खोया,
सुन्दर जवानी मस्ती में सोया,
ओम् नाम प्यारा नाम प्यारा ओम नाम ॥३॥
आया बुढ़ापा तो रोगों ने घेरा,
देख न पाये यार कब हो सवेरा,
कदम बढ़ा ले जो जाये आनन्द धाम ॥४॥
भजन नं १५४
तेरी शरण में आयें हैं, संसार के पिता । बंधन से मुक्त कर हमें, दुःख दर्द से छुड़ा ॥ आये है तेरे द्वार पर, झोली पसार कर। नैया हमारी हे प्रभु भवसागर से पार कर कुमार्ग से हटा हमें सन्मार्ग पर चला ॥ १ ॥
शक्ति के तुम भण्डार हो, बल हमको दीजिए। कृपा की दृष्टि हे पिता, हम सब पे कीजिए। हम दीन दु:खियों ने लिया है तेरा आसरा ॥ २ ॥ मोह माया काम क्रोध ने धेरा है आनकर। हमको सभी सताते हैं, बल हीन जानकर। इन क्लेशों और कष्टों से हमको दे बचा ॥३॥
हृदय हमारा शुद्ध हो, निर्मल हो आत्मा। दर्शन करें हम आपके जिसमें परमात्मा। आवागमन के चक्र से प्रभु हमें छुड़ा ॥४॥
भजन नं १५५
भगवान् जैसा कोई नहीं
भगवान् जैसा कोई नहीं २ वह तो जहान में सबसे बड़ा है। भगवान् जैसा कोई नहीं। इस जग का करतार वहीं आधार वही दातार वही।
मात-पिता और बंधु सखा जग में सब का भरतार वही है। निर्बलों अनाथों का भी वही आसरा है। भगवान जैसा: जब सब रिश्तेदार तोड़कर प्यार अगर मुँह मोड़ चुके हों। इस पर संकट काल या बिगड़े हाल समझ कर छोड़ चुके हो। कड़े वक्त में भी साथी परमात्मा है। भगवान जैसा... इधर उधर जो बचा के नजर दुनियाँ में अगर कोई पाप करेगा। देख रहा कण-कण में बसा वह उसकी नजर से बच न सकेगा। जिसे वह न जाने ऐसा दुनियाँ में क्या है। भगवान जैसा....... छल से रहित व्यवहार व सच्चा प्यार तुझे मंन्जुर नहीं है। बहुत निकट भगवान अरे इन्सान प्रभु कुछ दूर नहीं है। 'पथिक' जो बुलाए वह भी उसे ढूँढता है।
भगवान जैसा कोई नहीं ॥
भजन नं १५६
तेरी दया परमात्मा मुझ पर बनी रहे। यह दिल तुम्हारे प्यार से हरदम धनी रहे
।।
जीवन है चदरिया प्रभु भक्ति का रंग है। पूरी हो नाथ यह मेरे दिल की उमंग है। भक्ति के रंग से चदरिया सनी रहे। यह दिल......
बैठूं तेरे दरबार में हाजिर हुजूर मैं इक पल भी न रहूँ तेरे चरणों से दूर में। सर पर आशीर्वाद की छाया बनी रहे। यह दिल तुम्हारे......
बुद्धिपवित्र होवे बुराईयों से मैं टलूँ। छोड़ असत्य को मैं सत्य मार्ग पर चलूँ।
यज्ञादि कर्म में मेरी श्रद्धा घनी रहें। यह दिल......
परदेश में रहँ या मैं रहँ स्वदेश में शाही लिबास में चाहे भिक्षा के वेश में होठो पे 'पथिक' ओम् की मधुर ध्वनि रहे। यह दिल तुम्हारे.....
भजन नं १५७
हम सादर शीश झुकाते हैं, भगवान तुम्हारे चरणों में हम तन मन अर्पण करते हैं, भगवान तुम्हारे चरणों में.. ॥ आप बनाये रवि, शशी तारे, वन उपवन और पक्षी ये सारे हम देख देख हर्षाते हैं। मेघा बुद्धि हम में भरदो छल कपट और द्वेष को हर दो हम
सरिताएँ और पहाड़ बनाये, फल तरुवर और अन्न उपजाए हम ध्यान तुम्हारा लाते हैं।
बलबुद्धि और यश दो हमको, जिससे सुमिरे निशदिन तुमको हम ज्ञान आपसे पाते हैं।
ध्यान तुम्हारा लाते हैं। व्यापक हो प्रभु तुम कण-कण में बहा चराचर और जगत में हम जयजयकार मनाते हैं।
भजन नं ९५८
तर्ज-साजन मेरा.....
जिसको प्रभु से सच्चा प्यार है। जग में उसी का बेड़ा पार है।
उस नूर को समझता जो तू दूर है। ये तो तेरी नजरों का कुसूर है।
दिल में जो करता दीदार है। जग में उसी..... आफत जो तुझपे कोई आई है।
तेरे ही गुनाहों की कमाई है
गरीब का जो होता मददगार है। जग में उसी .....
ईश्वर को पायेगा क्या रुखा है। खुदगर्ज है जो दौलत का भूखा है।
संसार का जो करता उपकार है। जग में उसी..... बीज वही फलता है जो गलता है। प्यार में बलिदान देना पड़ता है।
बलिदान ही सब सुखों का आधार है। जग में उसी...... याद रख जो नारी को सतायेगा। बड़ा दुःख भोगेगा पछतायेगा। पति-पत्नी में जहाँ प्यार है। जग में उसी.... अभयराम काहे अमृत में विष घोलता। तज करके ईमान पाप तोलता। धर्म का जो करता व्यापार है। जग में उसी....
भजन नं १५९ - सांसों का क्या भरोसा ॥ सांसों का क्या भरोसा, रुक जाये कब कहाँ पर सांसों का क्या भरोसा ॥ मत हँस कभी किसी पे, न सता कभी किसी को । ना जाने कल को तेरा, क्या हाल हो यहाँ पर ॥ सांसों का क्या भरोसा.. ॥ जो हंस जैसा जीवन चाहता है ए बशर तू। चुन ले गुणों के मोती, बिखरे जहाँ-जहँ पर ॥ सांसों का क्या भरोसा.. ॥ कर कर्म इतना ऊँचा, कि बुलंदियों को छू ले। इज्जत से नाम तेरा, आ जाये हर जुबां पर । सांसों का क्या भरोसा.. ॥