शनिवार, २७ सप्टेंबर, २०२५

आज नवयुवकों की एक बड़ी संख्या ईश्वर-विश्वासी नहीं है। स्रोत- महात्मा आनन्दस्वामी जी का प्रवचनप्रस्तुतकर्ता - रामयतन

💥 ईश्वर की सत्ता पर भांति-भांति के प्रश्न 💥
" एक पिता हिरण्यकश्यप और पुत्र प्रहलाद जैसा "

एक पिता था हिरण्यकश्यप जैसा और पुत्र था प्रह्लाद जैसा अर्थात् पुत्र तो आस्तिक तथा पिता नास्तिक था। पुत्र बार-बार पिता से कहता कि नास्तिक बनना अच्छा नहीं, इससे कृतघ्नता का दोष लगता है। हमें अपनी उत्पत्ति,पालन, पोषण और निर्वाह में सहायक सभी का कृतज्ञ होना चाहिए। 
परन्तु पिता यही उत्तर देता कि तू हमसे जन्मा है अथवा हम तुमसे पैदा हुए हैं? तू हमें क्या सिखाएगा ? मूढ़ लोगों के पास बस यही युक्ति है।

एक दिन पुत्र ने साहस किया कि चाहे कुछ भी हो, हमारा कर्तव्य है कि पिता की नास्तिकता दूर करना चाहिए।

यह दृढ़ निश्चय करके पुत्र ने यह कार्य किया कि जहाँ पिताजी बैठा करते थे वहाँ एक सुन्दर, मनोहारी चित्र बनाकर दीवार पर लगा दिया। पिताजी आये और उनकी दृष्टि जब उस चित्र पर पड़ी तो उन्होंने प्रसन्न होकर पूछा- ये चित्र किस चित्रकार ने बनाया ? 
• पुत्र ने कहा- पिताजी, आलमारी के ऊपर से रोल के कागज आकर मेज पर फैल गये। फिर अलमारी में से विभिन्न रंगों के डिब्बे मेज पर आप पड़े। त्यों ही ब्रश भी आ गया और रंगों के डिब्बों के मुंह खुल गये। फिर ब्रश ने उचक उचक कर कागज पर ये सुन्दर चित्र बना दिये।

•पिताजी बोले- ऐसा कैसे हो सकता है ? बिना किसी के बनाये कैसे बन सकता है? अवश्य किसी दक्ष चित्रकार ने बनाया है। उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। 

•पुत्र बोला-पिताजी इस छोटे से पत्र पर इतनी सुन्दर रचना के लिए रचनाकार की अपेक्षा है तो क्या जगती तल- विश्व पटल पर परम सुन्दर,विचित्र दृश्य बिना किसी रचनाकार के बने हैं? क्या यह बुद्धिसंगत और तर्कसंगत है? पिताजी ऐसा सोचना अन्तःकरण चतुष्टय का दुरुपयोग है। कृतघ्नता दोष है। पिता को अपनी भूल समझ में आ गई।

पिता प्रसन्न हो गये और बालक को आशीर्वाद दिया।

"आज नवयुवकों की एक बड़ी संख्या ईश्वर-विश्वासी नहीं है।" 

स्रोत- महात्मा आनन्दस्वामी जी का प्रवचन
प्रस्तुतकर्ता - रामयतन

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